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एक तिब्बत, जो दिल्ली में भी बसता है

जब भी तिब्बत जाने की प्लानिंग कर रहे हों, तो ध्यान रखे एक तिब्बत दिल्ली में भी है, जहां आप तिब्बत की संस्कृति, हूबहू मकान और वहीं के लोगों के बीच खुद को पाएंगे। मैं आपको मजनू का टीला पर बनी तिब्बत कॉलोनी के बारे में बता रहा हूं, जहां आप घूमते हैं, तो एक बार आपको जरूर महसूस होगा कि आप दिल्ली में नहीं बल्कि तिब्बत में घूम रहे हो।

कहां है दिल्ली का तिब्बत

दिल्ली का तिब्बत यानी मजनू टीला स्थित तिब्बत कॉलोनी यमुना किनारे बसी हुई है। दिल्ली विधानसभा से एक किलोमीटर के भीतर यह इलाका आउटर रिंग रोड पर पड़ता है। हालांकि, अब इस जगह को पहचानने में एक ऐसा नाम कहें या फिर स्पॉट जुड़ गया है, जिससे तिब्बत कॉलोनी तक पहुंचना काफी आसान हो जाएगा। दरअसल, इस कॉलोनी के नजदीक से ही भारत के सबसे महंगे पुलों में शामिल सिग्नेचर ब्रिज का निर्माण किया गया है, जोकि अपने आप में दर्शनीय है।

क्या है यहां खास

तिब्बत कॉलोनी में सब कुछ वैसा ही देख सकते हैं, जैसा आपको तिब्बत और नेपाल में देखने को मिलता है। तिब्बती कॉलोनी में घुसने से पहले ही तिब्बती लोगों की कई दुकानें और सड़क किनारे लगी हुईं स्टॉल आपको दिखाई देंगी। वहां तिब्बती कपड़े, तिब्बती हैंडी क्रॉफ्ट, बुद्ध की प्रतिमाएं, जूलरी, तिब्ब्त के मशहूर अचार, तिब्बत के नूडल्स, कलरफुल मास्क, जूते आदि की बिक्री होती है। हालांकि, इनमें कुछ सामान मेड इन चाइना भी होता है, जिनमें सैंडल, छाता, बैग आदि शामिल हैं। यह सामान भले ही थोड़ा सा महंगा होता है, लेकिन अगर आप मोलभाव करना जानते हैं, तो कम खर्च कर ज्यादा सामान भी खरीद सकते हैं।

कई देशों के व्यंजनों का स्वाद

इस कॉलोनी की सबसे अहम और खास बात यही है कि यहां आप कई देशों के व्यंजनों का स्वाद ले सकते हैं। कॉलोनी में आपको तिब्बती व्यंजन के अलावा नेपाली, कोरियन, भुटानी के साथ ही और भी कई तरह के व्यंजन खाने को मिल सकते हैं। यह ध्यान जरूर रखें कि बुधवार के दिन कॉलोनी में बने किसी भी रेस्टोरेंट में आपको नॉन वेजिटेरियन फूड खाने को नहीं मिलेगा। तिब्बती व्यंजनों में मोमोज, थूबा, चाउमीन, लुफीम, थिग्मो है। इसके अलावा यहां की सबसे मशहूर फ्रूट बीयर तो दिल्ली के कई इलाकों से लोग पीने आते हैं। यह बीयर नॉन एल्कोहलिक होती है, जो लगभग कॉलोनी के सभी रेस्टोरेंट में मिल जाती है। यहां पहले छंग नाम की एल्कोहल मिलती थी, जिसे 1994 में बंद कर दिया गया। छंग तिब्बती परंपरा का हिस्सा थी।

कॉलोनी के आंगन की खास अहमियत

तिब्बती कॉलोनी में एक आंगन बना है, जो किसी भी तरह की कार्यक्रम से लेकर पूजा करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। यह आंगन कॉलोनी में बीचो-बीच बने मंदिर के पास है। यहीं पर पूजा-अर्चना के लिए सुबह और शाम के वक्त लोग पूजा करते हैं, तो बच्चे भी पूजा करने के लिए आंगन का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा घरों के छोटे- छोटे कार्यक्रमों को भी आंगन में ही सेलिब्रेट किया जाता है।वहीं बच्चों के खेलने की जगह भी यही आंगन ही होता है।

टूरिस्ट स्पॉट भी है यह

यह कॉलोनी तिब्बती लोगों के रहने के अलावा दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स से लेकर विदेशी पर्यटकों के लिए टूरिस्ट स्पॉट भी है। दरअसल, इस कॉलोनी की खासियत यहीं नहीं कि यह कॉलोनी तिब्बत का अनुभव कराती है, बल्कि कई प्रकार के व्यंजन हैं, जो यहां लोगों को खींच लाते हैं।

यहां नियम हैं बहुत जरूरी

बाकी दिल्ली की तुलना में यहां नियम थोड़े सख्त देखने को मिलते हैं। दुकानें शाम सात बजे तक बंद हो जाती हैं, तो सरकार के नियमों के मुताबिक, रेस्टोरेंट भी साढ़े दस बजे तक बंद कर दिए जाते हैं।

363 परमानेंट रजिस्टर्ड परिवार

तिब्बती कॉलोनी में लगभग 363 परमानेंट रजिस्टर्ड परिवार हैं, जिनमें करीबन 2 हजार लोग रहते हैं। इसके अलावा करीबन 4000 से अधिक बाहर से आए स्टूडेंट और किरायेदार भी यहां रहते हैं। तिब्बती कॉलोनी में रहने वाले लोगों की कुछ समस्याएं भी हैं। लगभग ज्यादातर लोगों के लिए यहां फूड और क्लॉथ मार्केट ही रोजी रोटी का जरिया है। दरअसल, भाषा के कारण अन्य लोगों से संपर्क बनाने में इन्हें काफी परेशानी होती है, जिस कारण वह कॉलोनी से बाहर निकलने में कतराते हैं। यह कॉलोनी साल 2012 में रेगुलर हो चुकी है।

इस कॉलोनी को साल 1960 में बसाया गया था। तिब्बती कॉलोनी को बनाने के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने मंजूरी दी थी। दरअसल, 1959 में चीन के क्रूर व्यवहार के कारण काफी संख्या में तिब्बती लोगों ने भारत की ओर पलायन किया था। यह कॉलोनी तभी से ही यहां बसी हुई है। एक तरह से भारत सरकार द्वारा यह जमीन तिब्बती लोगों को गिफ्ट दी गई है। इसके अलावा तिब्बती लोगों को यह भी अधिकार दिया गया है कि इस जमीन का एक फीसदी हिस्सा भी भारतीय नागरिक को नहीं दिया जाएगा या कोई भारतीय यहां जमीन खरीद नहीं पाएगा।

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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