Shyama Prasad mukherjee की मौत पर उनकी मां ने नेहरू से जांच की मांग की थी, लेकिन…

एक देश मे 2 निशान, 2 विधान और 2 सविंधान नही चलेंगे, यह नारा जनसंघ की नींव रखने वाले श्यामा प्रसाद मुख़र्जी का था. वही जनसंघ जो आज बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी है और जिसकी आज केंद्र में सरकार है. 23 जून 1953 के दिन उनकी मौत की खबर ने देश को हिला कर रख दिया था। कांग्रेस से राजनीति में कदम रखने वाले श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को नेहरू की सरकार में उद्योग और आपूर्ति विभाग सँभालने का मौका मिला था. लेकिन ऐसी क्या वजह रही कि श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने पद के साथ साथ पार्टी को भी छोड़ दिया और साल 1951 में नई पार्टी जनसंघ की स्थापना की.

चलिए विस्तार में बताते हैं.

कहा जाता है कि देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गाँधी के रिक्वेस्ट के बाद ही वो नेहरू की सरकार में शामिल हुए थे, इतिहासकार कहते हैं कि नेहरू उन्हें कम आंकते थे, जो श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को बिलकुल पसंद नहीं था. जबकि कहा जाता है कि श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने देश की पहली उद्योग नीति तैयार की थी, जो आगे चलकर मील का पत्थर साबित हुई.

वहीँ कहा यह भी जाता है कि साल 1950 में पाकिस्तान के अंदर हिन्दुओं पर अत्याचार बढ़ गया था, जिसका मुख़र्जी ने विरोध किया और सरकार से पाकिस्तान पर कड़ा एक्शन लेने की मांग भी की, लेकिन उनकी एक ना सुनते हुए नेहरू ने लियाकत अली से समझौता कर लिया. समझौते में कहा गया कि दोनों तरफ के रिफुजी बिना किसी परेशानी के एक दूसरे के देश में आ जा सकेंगे. जो बात मुखर्जी को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने इस्तीफा दे दिया. 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘भारतीय जनसंघ‘ नाम की एक पार्टी का गठन किया. पार्टी के गठन के बाद उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

1953 में कुछ कारणों की वजह से जवाहरलाल नेहरु ने कश्मीर को एक अलग राज्य बनाने का मन बना डाला. मुखर्जी को यह बात बिल्कुल रास नहीं आई. उनका मानना था कि भारत में यह एकता भंग करने वाला काम है. उन्होंने आर्टिकल 370 का बहिष्कार शुरु कर दिया. सड़क से लेकर सदन तक उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई.

दुर्भाग्यवश उनकी नहीं चली और आख़िरकार कश्मीर को अलग कर दिया गया. उसे अपना एक नया झंडा और नई सरकार दे दी गई. एक नया कानून भी जिसके तहत कोई दूसरे राज्य का व्यक्ति वहां जाकर नहीं बस सकता. सब कुछ खत्म हो चुका था, लेकिन मुखर्जी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे. ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ के नारे के साथ वह कश्मीर के लिए निकल पड़े.

नेहरु को इस बात की खबर हुई तो उन्होंने हर हाल में मुखर्जी को रोकने का आदेश जारी कर दिया. उन्हें कश्मीर जाने की इजाजत नहीं थी. ऐसे में मुखर्जी के पास गुप्त तरीके से कश्मीर पहुंचने के सिवा कोई दूसरा विकल्प न था. वह कश्मीर पहुंचने में सफल भी रहे. मगर उन्हें पहले कदम पर ही पकड़ लिया गया. उन पर बिना इजाजत कश्मीर में घुसने का आरोप लगा. एक अपराधी की तरह उन्हें श्रीनगर की जेल में बंद कर दिया गया.

कुछ वक्त बाद उन्हें दूसरी जेल में शिफ्ट कर दिया गया. जहां उनकी बीमारी की खबरें आने लगी. वह गंभीर रुप से बीमार हुए तो उन्हें अस्पताल ले जाया गया. वहां कई दिन तक उनका इलाज किया गया. माना जाता है कि इसी दौरान उन्हें ‘पेनिसिलिन’ नाम की एक दवा का डोज दिया गया. चूंकि इस दवा से मुखर्जी को एलर्जी थी, इसलिए यह उनके लिए हानिकारक साबित हुई. कहते हैं कि डॉक्टर इस बात को जानते थे कि यह दवा उनके लिए जानलेवा है. बावजूद इसके उन्हें यह डोज दिया गया.

धीरे-धीरे उनकी तबियत और खराब होती गई. अंतत: 23 जून 1953 को उन्होंने हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर ली. मुखर्जी की मौत की खबर उनकी मां को पता चली तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने नेहरु से गुहार लगाई कि उनके बेटे की मौत की जांच कराई जाये. उनका मानना था कि उनके बेटे की हत्या हुई है. यह गंभीर मामला था, लेकिन नेहरू ने इसे अनदेखा कर दिया. हालाँकि, कश्मीर में उनके किये इस आन्दोलन का काफी फर्क पड़ा और बदलाव भी हुआ. आज कश्मीर से धारा 370 हटा दी गई है. भारत का यह अभिन्न हिस्सा अब पूर्ण रूप से भारत का है. नरेंद्र मोदी सरकार ने श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के सपनों को पूरा करने का काम किया है.

 

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