‘कानाताल’ जाकर ‘नेनीताल’ को भूल जाएंगे आप

उत्तराखंड में चंबा मसूरी हाईवे पर टेहरी गढ़वाल जिले में स्थित कानाताल एक छोटा सा गांव है। कानाताल की हरी-भरी दुनिया अनायास ही हमारा मन मोह लेती है। हरे-भरे घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा प्रकृति के आंचल में ऐसा सुकून शायद ही कहीं और मिलेगा।

काफी समय पहले कभी अस्तित्व में रही एक झील कानाताल के नाम पर इस जगह का नाम पड़ा। लेकिन अब इस झील का कहीं नामो निशान भी नहीं है। कानाताल समुद्र सतह से 8500 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। सुकून और प्रकृति पसंद लोगों के लिए यह एक प्रसिद्द सैरगाह है। हरा भरा वातावरण, बर्फ से ढके पहाड़, कलकल करती बहती नदियाँ और जंगल इसकी सुंदरता को चार चांद लगाते हैं।

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अनुपम प्रकृतिक सौंदर्य 

कानाताल में आज भी अभी तक पूरी तरह प्रकृति का राज है। दूर-दूर तक न घर, न दुकानें, सिर्फ प्रकृति का अनुपम सौंदर्य – रंग-बिरंगी तितलियां, सुंदर फूल, चिड़ियों की कई प्रजातियां, फलों से लदे पेड़। सूरज इन पहाड़ों पर जल्दी उगता है और देर शाम तक डूबता है। एक तरह आए दिन चंबा, मसूरी असे मौसम आदी हिल स्टेशनों से गरमी की खबरें मिलती रहती हैं वहीं दूसरे तरफ काणाताल का सुहाना मौसम दिल के तार झनझना जाता है। मई से जुलाई तक तो खुशगवार मौसम हैं ही दिसम्बर से फरवरी में भी बर्फ से ढका काणाताल एक नए रूप में लुभाता है।

सुरखंडा देवी

कानाताल से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यहां का प्रसिद्ध सुरखंडा देवी का मंदिर। यह न केवल पर्यटक स्थल है बल्कि एक तीर्थ स्थान भी है। यह उन तीन मंदिरों में से एक है जिनकी हिंदू मत में काफी मान्यता है। यहां की लोककथा के अनुसार जब भगवान शिव देवी सती के शरीर को कैलाश पर्वत लेकर जा रहे थे तो इसी स्थान पर देवी का सिर गिरा था। वे सभी स्थान जहां जहां देवी के शरीर के हिस्से गिरे वे शक्ति पीठ के नाम से जाने जाते हैं और सुरखंडा देवी मंदिर उनमें से एक है। इस मंदिर में प्रतिवर्ष मई और जून के महीने में गंगा दशहरा उत्सव बहुत उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

इसके अलावा अन्य दो हैं चंद्रबदनी और कुंजपुरी।

कानाताल से 33 किलोमीटर की दूरी पर गंगा की मुख्य उप नदी भागीरथी पर टिहरी बांध। टेहरी बाँध जो दुनिया के सबसे उंचे बांधों में गिना जाता है। कानाताल का यह भी एक प्रमुख आकर्षण है। यह बाँध आसपास के क्षेत्रों को पानी की आपूर्ति भी करता है।

कोडिया का जंगल

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यहां से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है कोडिया जंगल। यहां तक पैदल भी जाया जा सकता है। यहां ट्रेकिंग के समय पानी के प्राकृतिक झरनों का आनंद उठाया जा सकता है। बार्किंग हिरण, जंगली सूअर, गोरल और मस्क हिरण इस जंगल में आम देखे जा सकते हैं।

मनोरंजन भी भरपूर

चीड़ और देवदार के वृक्षों से घिरा, जंगल में मंगल है यहां। यहां रहना अपने आप में एक अनोखा व सुखद अनुभव है। यहां से मसूरी शहर सिर्फ 40 किलोमीटर की दूरी पर है और धनौल्टी 15 किलोमीटर, चंबा 14 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां मल्टी कुजीन खाने से लेकर डिस्को, कॉन्फ्रेंस हाउस, प्रोजेक्शन स्क्रीन जो थिएटर का मजा भी देता है से ले कर अनेक इंडोर और आउटडोर खेलों का मजा भी लिया जा सोता है। जैसे पैराग्लाइडिंग, बॉन फायर, ट्रैकिंग आदि। अगर मौसम साफ हो तो यहां से गढ़वाल हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों का रुपहला नजारा भी देखा जा सकता है। यहां पहाड़ों पर जहां तक भी दूर दूर तक नजर जाती है वहां सीढ़ीनुमा खेती का अनोखा नजारा दिखता है। सीढि़यों पर सेब, आड़ू और खुमानी के पेड़ और उनसे होकर निकलती महकती हवा मदहोश कर देती है।

रिवर रॉफ्टिंग

कानाताल से करीब 75 किलोमीटर की दूरी पर है भगवान शिव के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध एक छोटा सा गांव शिवपुरी। शिवपुरी रिवर रॉफ्टिंग के लिए भी खासा मशहूर है। कानाताल एक ऐसी सैरगाह है जो सुखद शांतिपूर्ण अनुभव करा उसे कुदरत की देन और नियामतों का एक बार फिर आभास कराती है जिसे शायद शहरी दुनिया की दौड़भाग में भूल गए हैं। यहां नदी किनारे स्थित कैम्प में रात बिता सकते हैं और अगले दिन रिवर रॉफ्टिंग के लिए जाया जा सकता है। इस स्थान का शांत और सुरम्य वातावरण अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करता है।

आखिर कैसे जाएं कानाताल

कानाताल का निकटतम हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है जो 92 किमी. की दूरी पर स्थित है। देहरादून और ऋषिकेश कानाताल के निकटतम रेलवे स्टेशन है। हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, चंबा और टेहरी से लक्ज़री और नॉन लक्ज़री बसों द्वारा कानाताल तक पहुंचा जा सकता है।

 

 

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