आस्था और धर्म की नगरी वाराणसी

काशी, बनारस या वाराणसी। कोई भी नाम लें तस्वीर एक ही नजर आएगी और वह है आस्था और धर्म की। विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक वाराणसी की पहचान है पुण्य सलिला गंगा नदी, इसके घाट और मंदिर। यूपी में दो शहरों के नाम मुहावरों में शामिल हैं- सुबह-ए-बनारस और शाम-ए-अवध। यानी बनारस की सुबह अविस्मरणीय होती है तो लखनऊ की शाम।

सुबह यहां के प्राचीनतम और पवित्रतम घाट दशाश्वमेध घाट का नजारा जादुई होता है। एक तरफ सूरज की किरणें गंगा की कलकल कर बहती हुई लहरों से अठखेलियां करती हैं तो दूसरी तरफ घाट पर स्नान ध्यान शुरू हो जाता है। गंगा पर सूरज की किरणें कई रंग बिखेरती हैं। पहले हल्का सिंदूरी फिर पीला स्वर्णिम।

हिंदू धर्म में सर्वाधिक पवित्र नगरों में से एक वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी और इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर हजारों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा और विकसित हुआ है। भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं। वाराणसी को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है। कहते है कि बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।

वाराणसी नाम का उद्गम यहां की दो स्थानीय नदियों वरुणा और असि नदी से मिलकर बना बताया जाता है। ये नदियां गंगा नदी में उत्तर और दक्षिण से आकर मिलती हैं। वरुणा नदी को प्राचीन काल में वरणासि ही कहा जाता होगा तभी इस शहर को वाराणसी नाम मिला।

लंबे काल से वाराणसी को अविमुक्त क्षेत्र, आनंद कानन, महाश्मशान, सुरंधन, ब्रह्मावर्त, सुदर्शन, रम्य और काशी नाम से भी संबोधित किया जाता रहा है। स्कंद पुराण के काशी खंड में इस नगर की महिमा 15000 श्लोकों में कही गई है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना भगवान शिव ने करीब लगभग 5000 साल पहले की थी। जिस कारण ये आज एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। स्कंद पुराण, ऋग्वेद, रामायण, महाभारत सहित कई हिन्दू ग्रन्थों में इस नगर का उल्लेख आता है। वाराणसी को लगभग 3000 वर्ष प्राचीन माना जाता है। यह नगर मलमल, रेशमी कपड़ों, इत्रों, हाथी दांत और शिल्प कला के लिये व्यापारिक और औद्योगिक केन्द्र रहा है।

काशी विश्वनाथ

वाराणसी में शिव का एक प्रमुख ज्योतिर्लिंग है काशी विश्वनाथ का मंदिर। यहां हर समय भक्तों की भीड़ लगी रहती है जिनमें काफी विदेशी भी होते हैं। विदेशियों को मंदिर के अंदर जाने की इजाजत नहीं है। इस मंदिर की काशी में सर्वोच्च महिमा है, क्योंकि यहां विश्वेश्वर या विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है। इस ज्योतिर्लिंग का एक बार दर्शनमात्र किसी भी अन्य ज्योतिर्लिंग से कई गुणा फलदायी होता है।

मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को ध्वंस करवाया था और इसके अधिकांश भाग को एक मस्जिद में बदल दिया था। बाद में एक निकटस्थ स्थान पर मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया।

काशी विश्वनाथ मंदिर के समीप ही स्थित है यहां का सबसे शानदार घाट है। पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी ने इस घाट का निर्माण भगवान शिव के स्वागत के लिए किया था। वहीं दूसरी कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने यहां दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। यहां इस घाट पर मां गंगा की भी भव्य आरती देखते ही बनती है।

मणिकर्णिका घाट

इस घाट की भी दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक के अनुसार भगवान विष्णु ने भगवान शिव की तपस्या करते हुए अपने सुदर्शन चक्र से यहां एक कुंड खोदा था। उसमें तपस्या के समय आया हुआ उनका स्वेद भर गया। जब भगवान शिव वहां प्रसन्न हो कर आये तब विष्णु जी के कान की मणिकर्णिका उस कुंड में गिर गई थी। दूसरी कथा के अनुसार भगवाण शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नहीं मिल पाती थी। देवी पार्वती इससे परेशान हुईं और शिवजी को रोके रखने हेतु अपने कान की मणिकर्णिका वहीं छुपा दी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा। शिवजी उसे ढूंढ नहीं पाये और आज तक जिसकी भी अन्त्येष्टि उस घाट पर की जाती है, वे उससे पूछते हैं कि क्या उसने देखी है?

प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही चांडाल था, जिसने सत्यवादी राजा हरीशचंद्र को खरीदा था। उसने राजा को अपना दास बना कर उस घाट पर अन्त्येष्टि करने आने वाले लोगों से कर वसूलने का काम दे दिया था। इस घाट पर लगातार हिन्दू अन्त्येष्टि होती रहती हैं। घाट पर चिता की अग्नि लगातार जलती ही रहती है, कभी भी बुझने नहीं पाती।

असी घाट

असी घाट, असी नदी के संगम के निकट स्थित है। इस सुंदर घाट पर स्थानीय उत्सव और क्रीड़ाओं के आयोजन होते रहते हैं। ये घाटों की कतार में अंतिम घाट है। ये चित्रकारों और फोटोग्राफरों का भी प्रिय स्थल है।

दुर्गा मंदिर

दुर्गा मंदिर, जिसे मंकी टेम्पल भी कहते हैं। 18वीं शताब्दी में किसी समय बना था। यहां बड़ी संख्या में बंदरों की उपस्थिति के कारण इसे मंकी टेम्पल भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार मंदिर में स्थित मां दुर्गा की प्रतिमा मानव निर्मित नहीं बल्कि मंदिर में स्वतः ही प्रकट हुई थी। नवरात्रि के समय यहां हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ होती है। इस मंदिर में अहिन्दुओं का भीतर प्रवेश वर्जित है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा अन्नपूर्णा मंदिर, ढुंढिराज गणेश, काल भैरव, दुर्गा जी का मंदिर, संकट मोचन, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारतमाता मंदिर, संकठा देवी मंदिर और विशालाक्षी मंदिर आदि अन्य कई प्रमुख मंदिर भी हैं। वाराणसी मंदिरों का नगर है। लगभग हर एक चौराहे पर एक मंदिर तो मिल ही जायेगा। ऐसे छोटे मंदिर दैनिक स्थानीय अर्चना के लिये सहायक होते हैं। इनके साथ ही यहां ढेरों बड़े मंदिर भी हैं, जो वाराणसी के इतिहास में समय समय पर बनवाये गये थे।

राजा हरिश्चंद्र घाट और दशाश्वमेध घाट आदि पर बोटिंग की सुविधा भी है। आप चाहें तो यहां नौका विहार कर सकते हैं। ठंडी हवाओं के बीच मंद-मंद बहती गंगा की धारा पर नाव की सैर आपको याद रह जाने वाला अनुभव लगेगा।

वाराणसी जाएं तो सारनाथ भी जरूर जाएं। वाराणसी से सिर्फ 15 किलोमीटर की दूरी पर है सारनाथ। यहां गौतम बुद्घ से संबंधित ढेरों चीजें हैं। एक अच्छा संग्रहालय है तो सम्राट अशोक की तीन शेरों वाली वह लाट भी है जो भारत का राष्ट्रीय चिन्ह है।

अगर चाहें तो 35 किलोमीटर दूर चुनार भी जा सकते हैं। यहां भी गंगा नदी का किनारा है। यहां किले के अलावा वे खंडहर भी हैं जो देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति सहित कई अविस्मरणीय पुस्तकों में वर्णित हैं।

दिल्ली से वाराणसी के लिए सीधी रेल सेवा आसानी से उपलब्ध है। शहर में ठहरने के लिए अच्छे और सस्ते होटल तथा कई धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। कबीर से संबंधित यहां एक कबीर पीठ भी है जहां जाकर आप इस महान संत, कवि और दार्शनिक के बारे में बहुत सी बातें जान सकते हैं। वाराणसी में मौसम लगभग दिल्ली जैसा ही मिलेगा आपको। खरीददारी करनी हो तो बनारसी साड़ी पहली पसंद हो सकती है।

इस विश्व प्रसिद्घ शहर में देश-विदेश के लाखों लोग आते हैं।

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