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जहां इबादत धर्म नहीं लिंग के आधार पर होती है

कुतुब मीनार से आधे किलोमीटर की दूरी पर इमारतों/मकबरों के बीच किन्नर समुदाय का धार्मिक स्थल है। लोधी काल में यहां किन्नरों की 50 कब्र बनाई गई थीं, तभी से इसे लेकर किन्नरों में मान्यता बन गई। तब से आज तक यहां एक भी नई कब्र नहीं बनी है।

यह है किन्नरों का एक मात्र धार्मिक स्थल

धर्म के आधार पर तो ईश्वर की इबादत के लिए अलग-अलग धार्मिक स्थल तो खूब देखे होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लिंग के आधार पर भी धार्मिक स्थल हो सकता है? दिल्ली में एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां एक लिंग विशेष के लोगों की बीच ही मान्यता देखने को मिलती है। यह लिंग विशेष और कोई नहीं, बल्कि किन्नर समुदाय है। यह स्थल, ‘किन्नरों का कनख्वाह’ नाम से जाना जाता है। अन्य लोगों के लिए भी यहां आने-जाने में मनाही नहीं है। किन्नर समुदाय का यह पवित्र स्थल, क्यों किन्नरों के लिए खास है? आइए जानते हैं इस रिपोर्ट से।

सूफी संत की दरगाह से कुछ कदम दूर

साउथ दिल्ली का महरौली क्षेत्र ऐतिहासिक इमारतों और स्थलों से भरा हुआ है। यह बाहर से आने वाले सैलानियों में भी लोकप्रिय है। ऐतिहासिक तुर्क कालीन कुतुब मीनार महरौली का सबसे पॉपुलर स्पाट है। कुतुब मीनार के अलावा भी यहां कई मकबरे बने हुए हैं। इन सभी मशहूर इमारतों/मकबरों के बीच किन्नर समुदाय का धार्मिक स्थल किन्नरों का कनख्वाह भी मौजूद है। साउथ दिल्ली के महरौली गांव में सूफी संत कुतुबुदीन बख्तियार की दरगाह से कुछ ही कदमों की दूरी पर किन्नर समुदाय का पवित्र स्थल बना हुआ है।

किन्नरों की 50 कब्र ने दिलाई मान्यता

किन्नरों का कनख्वाह का प्रमुख द्वार एक लोहे का गेट है, जो ज्यादातर समय खुला ही रहता है। जब इस गेट से प्रवेश करते हैं, तो एक संकरा गलियारा बना हुआ है, जिसपर तीन से चार सीढ़ियां हैं। इन सीढ़ियों को चढ़ने के बाद एक खुली जगह, आसमान के नीचे यह धार्मिक स्थल है। वैसे तो यह स्थल दिखने में एक पुरानी मस्जिद लगती है, लेकिन हर वक्त खाली ही दिखाई पड़ती है। सफेद रंग की दीवारों से बने इस धार्मिक स्थल में 50 कब्र हैं। ये सभी कब्र किन्नरों की ही है। जिनकी मान्यता है कि यह लोधी काल यानी 15वीं सदी की बनी हुई हैं। यहां तबसे लेकर आज तक एक भी नई कब्र दिखाई नहीं बनाई गई है। किन्नरों का कहना है कि इस जगह की मान्यता आज से नहीं है। जबसे यहां किन्नरों की कब्र बनाई गई थीं, तभी से इस स्थल को लेकर इस समुदाय में मान्यता बन गई। मान्यता के पीछे यही मुख्य वजह है। कनख्वाह की जमीन से लेकर दीवारें भी साफ सुथरी रहती हैं। मानों, हर वक्त साफ सफाई रहती हो।

पड़ोसी राज्यों से भी आते हैं

इस धार्मिक स्थल को लेकर किन्नरों की बीच काफी मान्यता है। यहां किन्नर समुदाय के लोग गुरुवार और शुक्रवार को छोटे- बड़े समूह में प्रार्थना और दुआ मांगने आते हैं। स्थल में बनी कब्र पर फूल चढ़ाने के अलावा बाहर बैठे गरीबों को पैसे और खाना भी बांटते हैं। हालांकि, मुर्हरम और शब-ए-बरात वाले दिन यहां किन्नरों की सबसे ज्यादा संख्या देखने को मिलती है। इस जगह किन्नर आस पड़ोस के अलावा पुरानी दिल्ली, तुर्कमान गेट, शाहदरा, पड़ोसी राज्य हरियाणा, राजस्थान के अलावा महाराष्ट्र से भी आते हैं। प्रार्थना करने के अलावा किन्नर समुदाय यहां गीत संगीत भी करते हैं।

स्थानीय निवासियों को जानकारी नहीं

कुतुब मीनार से मात्र आधे किलोमीटर की दूरी पर किन्नरों का कनख्वाह मौजूद है, लेकिन इसकी जानकारी स्थानीय निवासियों को भी नहीं है। किन्नर समुदाय के इस धार्मिक स्थल तक पहुंचने के लिए स्थानीय निवासियों से जानकारी ली गई, तो उन्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। दरअसल, इलाके में दरगाह, मस्जिद और मकबरे इतने हैं कि किन्नरों का कनख्वाह आम लोगों की जानकारी से परे है। इसकी एक वजह यह भी है कि महरौली विलेज में बनी मार्केट की सड़क पर यह बना हुआ है, जिसका दरवाजा इतना छोटा है कि आम लोगों की नजरों में आसानी से नहीं आता। इस बारे में जानकारी सिर्फ स्थल से जुड़े हुए दुकानदारों को ही थी।

क्या है धार्मिक स्थल का इतिहास

माना जाता है कि किन्नरों का कनख्वाह नाम का यह धार्मिक स्थल 15वीं सदी में बनाया गया था। यह उस वक्त की बात है, जब मुगलों ने भारत में आना शुरू किया था।

किसे कहते हैं कनख्वाह

कनख्वाह एक पर्शियन शब्द है, जिसका अर्थ उस इमारत या स्थल से होता है, जहां एक समुदाय के लोग एक साथ इकट्ठा होकर शांति की दुआ करते हैं।

Image Source: Wikipedia

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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