Mugal Kaal Se Suru Hui Thi Delhi Ki Ramlila | NightBulb.in-Hindi Blog

जानें, दिल्ली में होने वालीं रामलीला का इतिहास Part-2

रामलीला मैदान

रामलीला मैदान में रामलीला देखने हजारों की तादाद में लोग जुटते थे। एक बार शायद 1985 या 1986 में बेशुमार भीड़ देखकर एक पुलिस अफसर ने रामलीला के जुलूस का रास्ता बदलने के लिए कह दिया। इस पर लोग एतराज करते हुए सड़कों पर लेट गए। लेकिन रामलीला के जुलूस का रास्ता बदलने से मना कर दिया। इस चक्कर में दिल्ली में तीन दिन रामलीला भी नहीं हुई थी। उस दौरान राजीव गांधी विदेश गए हुए थे। उन्हें जैसे ही पता चला कि दिल्ली में रामलीला नहीं हो रही हैं। उन्होंने तुरंत बूटा सिंह को कहा कि रामलीला शुरू करवाओ। उसके बाद बूटा सिंह ने जिस रास्ते से जुलूस आता था उसी रास्ते से जुलूस निकलवाया। तब जाकर रामलीला शुरू हुई। रामलीला का जो संविधान पंडित मदन मोहन मालवीय ने बनवाया था। वह आज भी चला आ रहा है। इंदिरा गांधी इस रामलीला को अपनी रामलीला बताती थीं। वह इस रामलीला को देखने के लिए राजीव, संजय और सोनिया को भी अपने साथ हमेशा लाती थीं।

सुभाष मैदान

आपने फिल्मी रामलीलाओं में तो कई ऐसे सीन देखे होंगे जिन्हें देखकर आप हतप्रभ रह गए होंगे। ऐसे ही कुछ यादगार वाकया दिल्ली की रामलीलाओं में देखने को मिले थे। दिल्ली में कई बार नाव में भी रामलीला हुई हैं। ताकि रामलीला का क्रम न टूटे। एक बार तो एक नाव में रामलीला हो रही थी और दूसरी नाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बैठकर रामलीला देख रहे थे। आजादी से पहले वायसराय रामलीला देखने आते थे। आजादी के बाद पंडित नेहरू ने रामलीला देखना शुरू कर दिया था।

पूराने जानकारों ने बताया कि एक बार पंडित जी इंदिरा जी के साथ रामलीला देखने आए थे। वह उस समय बीमारी से ठीक ही हुए थे। इसलिए उनके बैठने के लिए अलग से जगह बनाई गई थी। पंडित जी से पूछा आप क्या खाएंगे। पंडित जी का कहना था कि जो खिलाना है चुपचाप खिला दो। इंदिरा ने देख लिया तो खाने नहीं देंगी। पंडित जी के बारे में एक बात मशहूर थी। वह जब भी रामलीला देखने आते थे। रथ में बैठकर रामलीला ग्राउंड का चक्कर जरूर लगाते थे। उस दौरान वे बच्चों को टॉफिया भी बांटते थे। पहले ये रामलीला मंगलसैन कालोनी दीवान हाल के पास पंडित ज्योति प्रसाद के घर के बाहर और उसके बाद दीवान हाल के बाहर होती थी। बाद में इसे गांधी मैदान में मंचित किया जाने लगा। लेकिन 1958 में नव श्री धार्मिक लीला कमेटी को गांधी मैदान दिए जाने की बात से रामलीला कहां दिखाएं फिर से समस्या खड़ी हो गई। इसके बाद ही ये रामलीला 1958 में सुभाष मैदान में शुरू हुई। पहले रामलीला केवल तीन-चार हजार रुपए में हो जाती थी। रामचन्द्र जी राजा राम वाली ड्रेस में वनवास काटते थे।

यमुनापार सरकुलर रोड

दिल्ली की प्राचीनतम रामलीलाओं में अगर यमुना पार सरकुलर रोड की रामलीला का जिक्र न किया जाए तो रामलीलाओं का इतिहास अधूरा माना जाएगा। क्योंकि यह रामलीला 1951 में शुरू हुई थी। इस रामलीला को देखने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, मेरठ और हापुड़ के आसपास के क्षेत्रों से लोग रामलीला देखने आते थे। दशहरा के दिन लीला स्थल पर इतनी भीड़ हो जाती थी कि लोग शाहदरा स्टेशन पर खड़े होकर पुतलों को जलता हुए देखते थे। इस मैदान में पानी भरने के कारण कई बार नाव में भूमि पूजन किया गया। एक बार तो दशहरा के दिन पुतलों को लिटाकर जलाया गया था।

शाहदरा की रामलीला की झांकी भी बहुत प्रसिद्घ थी। इस झांकी में सीता के पहनने के लिए शाहदरा के व्यापारियों के घरों से जेवरात आते थे। व्यापारियों में यह होड़ लगती थी कि आज उसके घर के जेवरात पहनकर सीता जी रथ में बैठेंगी। झांकी निकालने के दौरान शाहदरा, बड़ा बाजार में रात के समय सांग भी किए जाते थे। मुकाबले के लिए दो सांगी लक्ष्मी चंद और चंदर नट आते थे। जो रात भर सांग करते थे।

अशोक विहार फेस वन

दिल्ली की अन्य रामलीलाओं की तरह अशोक विहार की रामलीला का इतिहास भी 31 साल पुराना है। यहां की रामलीला की खास बात है कि यह रामलीला रामचरित मानस की चौपाई के आधार पर होती है। इस रामलीला को दिल्ली की प्रथम रामलीला के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने फिक्की ऑडीटोरियम में सम्मानित किया गया था। दशहरा और भरत मिलाप अशोक विहार में स्टेज लगाकर मनाया जाता है। इस दिन अशोक विहार की सड़कों को फूलों और लइटों से जगमग कर सजाया जाता है। इस रामलीला में अटल बिहारी वाजपेयी, एलके आडवाणी आदि कई बार आ चुके हैं। इस रामलीला को शुरू से ही एक ही टीम के कलाकार करते आ रहे हैं। इन्द्रप्रस्थ विस्तार रामलीला को यमुनापार में चौथे पुतले जलाने के नाम से खासा जाना जाता है। इस रामलीला में हर साल समाज की दुश्मन किसी बुराई का पुतला जलाया जाता है। इस रामलीला की शुरुआत 1994 में एक दिन का दशहरा के रूप में शुरू की गई थी।

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