क्या होते हैं दंगों के दूरगामी परिणाम ? पढ़िए यह ख़ास रिपोर्ट

नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में माहौल भले ही धीरे-धीरे शांत होता चला जाएगा। सड़कों से आर्मी कम होती जाएगी, समय के साथ साथ नॉर्मल ज़िंदगी सड़कों पर उतर जाएगी। लेकिन दंगा जिन इलाको में होता है, वहां उसके दूरगामी परिणाम क्या होते हैं ये नफरत की आग बुझने के बाद दिखाई देने लगते हैं।

बीते दिन गामड़ी इलाके में भारी मात्रा में किराए पर रहने वाले एक समुदाय ने दिल्ली छोड़ अपने-अपने गांव और शहर की ओर पलायन किया है। कुछ ऐसे ही पूरे नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में बड़ी-बड़ी राशन और थोक की दुकान लूट लिए जाने की वजह से घर की जरूरत का सामान भी मंहगा हो चुका है।

इलाकों में दूध और ब्रैड आदि की भी सप्लाई कम होने से रेट में 2-2 रुपए का अंतर आया है। इतना ही नहीं, इस पूरे इलाके में गाजियाबाद स्थित लाल बाग मंडी से सब्जियां आती हैं, लेकिन रास्ते बन्द होने और रेहड़ी रिक्शा आदि के ना होने से इलाके में सब्जियों की भी आपूर्ति नहीं हो रही है। जो सब्जियां शाहदरा मंडी से आ रही हैं, उनकी कीमत डेढ़ से दोगुना है।

ये ऐसे परिणाम हैं जो पहले दिन से शुरू हो जाते हैं, लेकिन समय रहते रहते वापस से ठीक होते दिख जाते हैं। वहीं, आप दूरगामी परिणाम की बात करें तो नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में जमीन के दाम कोड़ी के भाव होने जा रहे हैं। मार्केट मंदी होने का असर तो पिछले कई सालों से है ही, लेकिन अब मकान की कीमत उस कीमत की भी आधी होती साफ दिखाई देगी। एक समुदाय अपने इलाके में दूसरे समुदाय को घर खरीदने के लिए रोकेगा तो वहीं उसी समुदाय का व्यक्ति भी इन इलाके में हुए दंगे होने से मार्केट के अनुसार दाम नहीं देगा।

इसके अलावा, इलाके में दशकों के भाई चारे पर जो डेंट लगा है, उसे ठीक होने में कई साल लग जाएंगे। एक दूसरे इलाके में अपना काम धंधा जमा चुके लोगों को अब नए सिरे से अपना काम शुरू करना होगा और आखिरी में वही बात जो मैंने इस लेख में सबसे पहले लिखी कि अपने मकानों में किराए के जरिए घर चलाने वालों को भी सीधे तौर पर नुकसान होना शुरू हो जाएगा। दंगा होने से एक इलाका आम लोगों की नजरों में नेगेटिव हो जाता है, जिसका असर वहां की वैल्यू पर सबसे अधिक पड़ता है। दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में दंगा शहर के करैक्टर सर्टिफिकेट को बिगाड़ देता है.

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

Leave a reply:

Your email address will not be published.

Site Footer