सबकी रोटियां सिकनी भी तो जरुरी हैं

सबकी रोटियां सिकनी भी तो जरुरी हैं. सही बात है, रोटी नहीं सिकेगी तो पेट कैसे भरेगा। रोटी खाई जाएगी, तभी तो चैन की नींद आएगी। ये वो रोटी है, जो हर कोई अपने अपने अनुसार सेक रहा है. कोई धर्म की रोटी सेक रहा है, तो कोई जात की. कोई किसी अनुछेद को पकड़कर अपना धंधा चला रहा है, तो कोई किसी अधिकार को अपनी गोदी में संभाल कर रखे बैठा है.

अब हम सीधे बात करते हैं.

हैदराबाद में पुलिस वालों ने आरोपियों के एनकाउंटर हुए तो मानवाधिकार की रक्षा करने वालों ने रोना शुरू कर दिया. कानून बनाने वाले सांसदों ने कानून के अनुसार फैसला करने की बात कही. आज की खबर तो यह है कि मुंबई के वकीलों ने तो पुलिस वालों के खिलाफ एफआईआर करने की भी मांग कर दी है. दूसरी ओर, उन्नाव जिले की लड़की को जिंदा जलाने के बाद आज उसकी मौत हो गई तो नेताओं ने धरना दिया। मानवाधिकार आज इस मामले पर चुप रहा. मीडिया ने सरकार से सवाल पूछने शुरू किए. आम लोगों ने भी रोष दिखाया. सभी का अपना अपना तरीका दिखाई दे रहा है. कुछ मीडिया पत्रकारों ने तो इसमें भी जात ढूंढ ली कि उन्नाव रेप केस आरोपी अगर विशेष वर्ग से होते तो योगी सरकार और उनके समर्थक सड़कों पर उतर जाते और तुरंत करवाई करने की मांग करते.

यानी आप समझ सकते हैं कि मामले पर सटीक निशाना किसी का नहीं है. बल्कि सभी अपनी रोटियां सेकने में व्यस्त हैं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. साल 1995 में भंवरी देवी रेप केस हुआ था, जिसके बाद 1996 में प्रियदर्शनी रेप केस, 2012 में निर्भया रेप केस, 2013 में शक्ति मिल मुंबई, 2017 में उन्नाव रेप केस और 2019 में प्रियदर्शनी रेड्डी रेप केस. इन सभी मामलों में लाखों लोगों का गुस्सा सड़कों पर दिखा, लेकिन सुधार नहीं हुआ. हालांकि कानून भी बनाए गए, लेकिन कानून का डर तो उसके उल्लंघन के बाद ही होता है.

महिलाओं का सम्मान नहीं तो कैसे होगी 21वीं सदी भारत की सदी

आज एक और बयान चर्चा में रहा. कांग्रेस के नेता और पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने देश को दुनिया की रेप कैपिटल कह दिया. हम सभी को बुरा लगा. यह एक विवादास्पद बयान भी है. लेकिन क्या यह हकीकत नहीं है ? एक तरफ हम दुनिया को 21वीं सदी एशिया की सदी बता रहे हैं, लेकिन वहीं विकसित देश ब्रिटेन और अमेरिका अपनी महिला सिटीजन के लिए भारत घूमने पर एडवाइजरी जारी कर रहे हैं.

आखिर ये चल क्या रहा है ? HowdyModi जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विभिन्न देशों में कई कार्यक्रम हुए. इन कार्यकर्मों को भारत की इज्जत से जोड़ा गया. कहा गया कि मोदी जी ने देश का सम्मान बढ़ाया है. लेकिन क्या महिलाओं के प्रति डबल स्टैण्डर्ड देश की इज्जत एक ब्लैकलिस्ट देश के बराबर नहीं बना रहा है ? भारत में इस वक़्त करीब करीब डेढ़ लाख रेप के मामले अदालतों में पेंडिंग पड़े हैं. भारत में आम मर्डर की तुलना में रेप के मामले दोगुने हो रहे हैं. ऐसे में हैदराबाद का एनकाउंटर अगर गलत है तो मामले सुलझाने के लिए कौन आएगा? अगर सरकारों से सवाल पूछना स्वाभाविक है, तो क्या जजों को भी कटघरे में खड़ा करना जरुरी नहीं है ? सवाल एक आम आदमी के जहन में भरे पड़े हैं. शायद कुछ ऐसे ही होंगे ? लेकिन इनका जवाब किसी के पास नहीं है. क्यूंकि “सबकी रोटी सिकनी भी तो जरुरी है”

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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