गरीबों को शोषण की आदत हो चुकी है. जानिये कैसे

भारत जैसे देश में जहां कई सीख हमें जन्म से ही दी जाती हैं, वहां एक गरीब परिवार में बाप बेटे को सबसे पहले सिर्फ यही सिखाता है कि – बेटा इस ज़िन्दगी से जंग तुझे खुद लड़नी है. यानी तुझे सिर्फ खुद पर भरोसा करना है.

देश आजाद हुआ और देश के दो हिस्से हुए. तभी से आज तक का इतिहास पढ़ लीजिए तो एक बात साफ़ नजर आ जाएगी कि निचला तबका यानी मजदुर-गरीब वर्ग देश की सरकारों की तरफ देखता तो जरूर है, लेकिन कभी उनपर निर्भर नहीं रहा. कभी सोचा है क्यूं।

उदाहरण से समझिये. जब आप किसी काम में सैकड़ों बार असफल हो जाएं तो आपके मन से उस काम के सफल होने की आस खत्म हो जाएगी। एक और लीजिए। अगर आपका बच्चा लगातार किसी क्लास में फ़ैल होता रहे, तो भी आपके मन में अपने बच्चे के पास होने की आस खत्म हो जाएगी।

वैसे ही, जब एक गरीब परिवार और उसके पूर्वजों को कई सालों तक उसके ही हाल पर छोड़ा गया तो उससे आप कैसे आस कर सकते हैं कि वो आपके एक कहने पर किसी भी तरह का रिस्क ले लेगा. खासकर तब तो बिलकुल भी नहीं, जब उसके बच्चे का पेट न भरा हुआ हो. उसकी आस जब प्रशासन की तरफ से खत्म हो जाती है, तभी वो 200-200 किलोमीटर पैदल चलने की हिम्मत दिखाता है. दिल्ली से बदायूं तक बच्चों को कन्धों पर लेकर चलने की शुरूआत करता है.

ये है वो आस, जिसे सत्ता में बैठी सरकार और उनके मुलाजिमों से लेकर चमचों तक ने ख़त्म किया. केंद्र से लेकर ग्राम पंचायत तक सभी ने सालों तक इनका ऐसा शोषण किया कि इनको अब इसकी आदत हो चुकी है. ऐसे में अब वो दुनिया को उसी तरह से देखता है. उसको लगता है कि सरकारें, अधिकारी सब उस भेड़ियें की तरह ही हैं जो सिर्फ उन्हें अपना खाना समझें हमला करने की ताक में रहता है. दरअसल, इनकी और इनके पूर्वजों की आस को सत्ताधारियों ने ऐसी पटखनी दी है कि अब उनकी आत्मा किसी पर भरोसा नहीं कर पातीं और ना ही लड़ने का दम रख पाती.

ये आस सिर्फ राजनितिक स्तर पर ही खत्म नहीं की गई है. इसका श्रेय उस सोच को भी जाता है जो हमारे सामाजिक तानेबाने में भी दिखाई देता है. मॉडर्न हाई प्रोफाइल में 28% GST के साथ साथ बिल का भुगतान करने वाले हम जैसे लोगों को इनके 10 रुपया मारने में मजा आता है. हम उसे सरल भाषा में सेविंग्स(Savings) कहते हैं.

इसके बाद भी अगर हम उनको ये कहें कि इन्हें समझ ही नहीं आ रहा. ये अपने साथ साथ कितनों को मरीज बना देंगे। इन्हें कोरोना जैसी भयंकर बिमारी के बारे में क्या पता. या फिर उन्हें सोशल मीडिया अकाउंट पर गाली दें. तो मेरे प्रिय भारत वासियों तुम्हें अपने मानसिक इलाज की जरुरत है. इन्हें तो वही आदमी याद रहेगा जिसने इन्हें अपने हाथों से खाना दिया और बच्चों के लिए बिस्कुट का पैकेट.

धन्यवाद.

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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