देश को कब तक बरगलाएगी एकतरफा मीडिया?

देश की मीडिया कब तक बरगलाने का काम करती रहेगी? कब तक मीडिया की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाएगी? कब तक मीडिया का एक वर्ग देश में आग लगाने वालों के साथ मिलकर घी का काम करेगा? आखिर कब तक?

संसद का वो दिन था, जब सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट बिल पास हुआ। उसी दिन से मीडिया के एक वर्ग ने देश को बर्बाद करने की मानों जिम्मेदारी ले ली थी। शुरू से बताते हैं। CAA के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन जब तक हिंसक नहीं हुआ तब तक मीडिया की खबरों को उठा कर देख लीजिए कहीं भी आपको बिल के प्रति जागरूक करने या आम लोगों की शंका से जुड़े सवालों के जवाब जैसी कोई खबर ना ही छपी और ना ही दिखाई गई। मैं उस हिंसा की बात कर रहा हूं जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से शुरू हुआ था।

दुनिया भर का ज्ञान पेलने वाले पत्रकार ठंड में कुछ महीने के बच्चे को लेकर बैठी महिला के मुंह पर माइक लगाकर सिर्फ यही पूछते रहे कि आप बिल के खिलाफ क्या कहना चाहती हैं, जबकि यह जानते हुए भी कि एक साधारण महिला को एक ऐसे बिल की क्या जानकारी होगी जिसे अलग अलग मीडिया अपने अपने अनुसार बता रहा हो?

विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों की वायरल वीडियो आपने देखीं होंगी, जिनमें साफ साबित होता है कि उन्हें बरगलाया जा रहा है या उन्हें जागरूक करने की बजाय उनकी नासमझी पर पीठ थपथपाई जा रही है। उनके मुंह से डिटेंशन सेंटर में भेजने की बात करने से लेकर पाकिस्तान भेजने का डर पर मीडिया सिर्फ चुप होकर उनके डर को कैश करता रहा।

हालांकि, सरकार से सवाल पूछे गए। गृहमंत्री ने अलग अलग न्यूजचैनल पर अपने इंटरव्यू भी दिए, लेकिन मीडिया ने अपना मेडियेटर यानी बीच में रहकर दलाली करने का ही मात्र काम किया। उन दिनों दा वायर, क्विंट जैसे ऑनलाइन और फॉरेन फंड से चलने वाली ऑनलाइन वेबसाइट ने तो जानकारी तो बिल्कुल भी सांझा नहीं की, बल्कि प्रदर्शनकारियों को उकसाने और भड़काऊ खबरें सप्लाई कीं। माहौल को गरम करने का प्रयास भी जारी रखा। कई अख़बार ने भी बड़ी बड़ी बेतुकी खबरों से माहौल ठंडा ना होने की जिद तक ठानी हुई थी। आम लोगों को यह तक बताया जा रहा था कि यह सरकार आप लोगों को हमें हकीकत बताने तक रोक रही है। ऐसे में जिस मीडिया वर्ग ने जागरूक करने की कोशिश भी की, उसे गोदी मीडिया जैसे शब्दों से नवाजा गया। इसका असर यह हुआ कि बिल की कम जानकारी ने आज दिल्ली को यह उग्र रूप दिखा दिया।

अगर मेरी जानकारी गलत लगती है तो बिल पास होने से लेकर शुरुआत में हुई हिंसा के बाद सरकार द्वारा मीडिया को बिल पर जागरूक करने के निर्देश देने तक एक भी ऐसी कोई न्यूज़, रिपोर्ट, फीचर मुझे दिखा दीजिए जिसमें बिल से जुड़े सवालों और आम लोगों की शंकाओं को खत्म करने की कोशिश की गई हो।

अंत में बस एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि यदि मीडियाकर्मी यही सोचते हैं कि मीडिया का काम सिर्फ बीच में रहकर इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करना होता है, तो पर्सनल ज़िंदगी में अपने सोशल मीडिया अकाउंट को चलाना बन्द कर दे। अपनी पसंद के अनुसार खबरों का चयन करने वाली मीडिया कर्मियों ने खुलेआम अपने पर्सनल अकाउंट से आम लोगों को अप्रत्यक्ष तौर पर भड़काने का काम किया है। शर्म करो।

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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