मंडी को कहा जाता है – हिमाचल का काशी

मंडी, हिमाचल प्रदेश का एक ऐसा शहर है, जिसका नाम मण्डव ऋषि के नाम पर रखा गया है। कहा जाता है कि एक समय था, जब मंडी व्यापारिक दृष्टि के बेहद महत्वपूर्ण था। यह व्यास नदी के किनारे बसा हुआ है। आज भी मंडी में कई रमणीय स्थल हैं। हिमाचल का सांस्कृतिक और धार्मिक मिश्रण यहां के देवी-देवताओं में भी है, जो सजधज कर पालकियों में पुजारियों के कंधों पर सवार होकर मंडी में मनाए जाने वाले ऐतिहासिक मेले में आज भी आकर एक अद्भुत रोमांच कारीदेव समागम का दृश्य पेश करते हैं।

आइए बताते हैं मंडी से जुड़ी और भी दिलचस्प बातें

मंडी अपने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। प्राचीन समय में यह रास्ता मारकंड और लद्दाख से मैदानों की ओर जाता था, जो आज भी वैसा ही है। राजा बानसेन के वंशज अजबर सेन ने 1527 ईसवी में मंडी नगर के नींव रखी थी। मंडी को अक्सर वाराणसी ऑफ हिल्स या छोटी काशी या हिमाचल की काशी के रूप में जाना जाता है। दरअसल, मंडी में करीब 81 शिव मंदिर हैं, जिनमें भूतनाथ, त्रिलोकीनाथ, अर्द्धनारीश्वर और एक दशा रूद्र महादेव का अपना ऐतिहासिक महत्व है।

मंडी का इतिहास कुछ ऐसे है

1648 में बानसेन के वंशज राजा सूरजसेन ने औलाद न होने के कारण घोषणा की थी कि उसकी मृत्यू के बाद मंडी रियासत की मूर्ति के रूप में राजा माधव असली शासक होगा। इसलिए आज भी शिवरात्रि में शिव के साथ-साथ राजा माधव की मूर्ति की भी पूजा की जाती है।

एक मान्यता यह भी है कि अजबर सेन को कई दिनों तक सपनों में एक कामधेनू गऊ दिखाई देती रही, जो वर्तमान में मंडी में स्थापित भूतनाथ मंदिर के पास शिवलिंग की पूजी करती थी। राजा ने उस स्थान को देखने का फैसला किया और वहां शिवपिंडी के दर्शन होने पर उसने अपनी राजधानी भी पुरानी मंडी से वर्तमान मंडी में स्थानान्तरित कर दिया।

त्रिलोकनाथ शिव मंदिर

नागरी शैली में बने इस मंदिर की छत टाइलनुमा है। यहां से आसपास के सुंदर नजारे देखे जा सकते हैं। मंदिर  से नदी और आसपास के क्षेत्रों का खूबसूरत नजारा देखा जा सकता है। यहां भगवान शिव को तीनों लोकों के भगवान के रूप में चित्रित किया गया है। मंदिर में स्थित भगवान शिव की मूर्ति पंचानन है, जो उनके पांच रूपों को दिखाती है।

भूतनाथ मंदिर

मंडी के बीचों बीच स्थित इस मंदिर का निर्माण 1527 में किया गया था। यह मंदिर उतना ही पुराना है, जितना यह मंडी शहर। मंदिर में स्थापित नंदी की प्रतिमा बुर्जु की ओर देखती प्रतीत होती है। मार्च में मनाए जाने वाली शिवरात्रि का केंद्र भूतनाथ मंदिर होता है।

श्यामाकाली मंदिर

टारना पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर को टारना देवी मंदिर भी कहा जाता है। राजा श्याम सेन ने 1658 ईसवी में इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। अपने वारिस के पैदा होने की खुशी में देवी को धन्यवाद देने के लिए उन्होंने यह मंदिर का निर्माण करवाया था। भगवान शिव की पत्नी सती को समर्पित इस मंदिर का पौराणिक महत्व है।

सुंदरनगर

मंडी से 26 किलोमीटर दूर सुंदरनगर भी अपने मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। खूबसूरत हरी भरी घाटियों के इस क्षेत्र में ऊंचे-ऊंचे पेड़ों की छाया में चलना बहुत ही सुखद अनुभव होता है। पहाड़ी के ऊपर सुकदेव वाटिका और महामाया का मंदिर है, जहां हर साल हजारों भक्त दर्शनों के लिए आते हैं। एशिया का सबसे बड़ा हाइड्रो इलैक्ट्रिक प्रोजेक्ट भी सुदंर नगर का हिस्सा है।

इतना ही नहीं, यहां एक अत्यन्त मनोहर झील भी है। यहां रात का दृश्य बहुत ही सुंदर होता है। शीतला माता और कुमारी माता का मंदिर भी दर्शनीय है। यहां का स्नतकोत्तर संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत पढ़ने की उत्तम व्यवस्था है।

जंजैहली

मंडी से जंजैहली 82 किलोमीटर है। यह एक बहुत ही रमणीय स्थल है। मंडी से आप जंजैहली तक वाया चैलचौक-थुनाग से पहुँच सकते  हैं यहां के ऊँचे ऊँचे पहाड़ और बर्फ से ढके पहाड़ मन मोह लेंगे।

अर्द्धनारीश्‍वर मंदिर

सातवीं शताब्‍दी में बना यह मंदिर स्‍थापत्‍य कला का बेजोड नमूना है। यहां भगवान शिव की सुंदर प्रतिमा स्‍थापित है। प्रतिमा आधे पुरूष और आधी महिला के रूप में है,  जो दर्शाती है कि नारी और पुरूष दोनों का अस्तित्‍व एक दूसरे पर निर्भर है।

तत्ता पानी

तत्ता पानी का मतलब गर्म पानी होता है। चारों ओर पहाड़ों से घिरा तत्‍ता पानी, सतलुज नदी के दायें तट की खूबसूरत घाटी पर स्थित है। प्राकृतिक सल्‍फर युक्‍त इसका पानी बहुत शुद्ध और अलौकिक शक्तियों से युक्‍त माना जाता है। कहा जाता है कि इसके पानी से बहुत-से राजाओं के शरीर के रोग ठीक हो गए थे। सतलुज नदी के जल में उतार-चढ़ाव के साथ इसके जल में उतार-चढ़ाव आता रहता है।

बरोट

बरोट एक शानदार पिकनिक स्‍थल के रूप में लोकप्रिय है। मंडी से 65 किलोमीटर दूर मंडी-पठानकोट हाइवे पर यह स्थित है। यहां का रोपवे और फिशिंग की सुविधाएं पर्यटकों को काफी आकर्षिक करती हैं।

शिकारी देवी मंदिर

समुद्र तल से 3332 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर मानवीय शोर-शराबे से एकदम मुक्‍त है। सूर्योदय और सूर्यास्‍त के मनमोहक नजारे यहां से बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। चैल चौक,  जंजैहली, करसोग और गोहर से होते हुए यहां पहुंचा जा सकता है।

कमरुनाग

कमरुनाग मंडी जिले में सबसे ज्यादा पूजनीय देवता हैं। इन्हें वर्षा का देवता भी कहा जाता है। ऊँची पहाड़ियों में चारों और से देवदारों से घिरे इस देवता के मन्दिर में प्रत्येक वर्ष जून-जुलाई में मेले का आयोजन होता है। हजारों लोग पैदल यात्रा करके यहां पहुंचते हैं। यहाँ तक श्रद्धालु वाया चैलचौक, रोहांडा, करसोग से होकर आ सकते हैं। शांतवादियों में स्थित इस स्थल की अपनी ही एक पहचान है।

पराशर झील

पराशर झील मंडी से करीब 40 किलोमीटर दूर उत्‍तर में स्थित है। पैगोड़ा शैली में बना संत पराशर को समर्पित तीन मंजिला मंदिर इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है। हिमाचल प्रदेश का भुंतर हवाई अड्डा मंडी से करीब 63 किलोमीटर की दूरी पर है। सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन कीरतपुर में है जो मंडी से करीब 125 किमी की दूरी पर है।

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