3000 वर्ष पुराना है दिल्ली का कालकाजी मंदिर

मां कालका जी को दिल्ली की देवी भी कहा जाता है। मां कालका के दर्शनों के लिए रोजाना लाखों श्रद्घालु अलग अलग राज्यों से कालका जी मंदिर में आते हैं। मां दुर्गा के सिद्घपीठों में से एक दिल्ली का कालका जी मंदिर में फूलों की सुगंध मन मोह लेती है।

कालका जी मंदिर के बारे में मान्यता

मान्यता है कि भगवान शिव के साथ मां पार्वती अरावली पर्वत श्रंखला पर अपनी संपूर्ण शक्तियों के साथ एक स्थान पर बैठ गईं, धर्मग्रंथों के मुताबिक यह वही स्थान है जिसे मां कालका मंदिर कहा जाता है। यह स्थान उत्तर भारत की सिद्घपीठों में से एक है, कालका देवी का यह मंदिर दिल्ली में अरावली पर्वत श्रंखला की पहाड़ियों पर सूर्य कूट पर्वत के भाग पर बना हुआ है। इसके बीचोंबीच माता की प्रतिमा है जो कि स्वयंभू है। कालकाजी मंदिर का इतिहास लगभग 3000 वर्ष पुराना माना जाता है।

महाभारत के अनुसार इंद्रप्रस्थ की स्थापना के समय सभी पांडव भगवान श्री कृष्ण के साथ यहां आए और सिद्घपीठ पर आकर माता की पूजा अर्चना की। मंदिर का भवन अष्ठकोण पर तांत्रिक विधि से बना हुआ है। इसमें बारह द्वार हैं, और बाहर की परिक्रमा में छत्तीस द्वार हैं, मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में मेन गेट के दाहिने ओर है। परिक्रमा से सटा हुआ एक छोटा सा शिवालय है। उत्तर दिशा में गणेश जी की मूर्ति है, कुछ दूरी पर भैरव जी और हनुमान जी के मंदिर हैं, मंदिर के सामने की ओर मुख्य द्वार से लगभग चौदह फुट की दूरी पर शेरों की दो मूर्तियां हैं, जिनके ऊपर चौरासी घंटियां लगी हैं।

ऐसी मान्यता है कि यहां सच्चे हदय से जिसने जो मांगा उसकी मुराद पूरी होती है, मां उन्हें सुख समृद्घि का वरदान देती हैं। यहां आने वाले ऐसे भी भक्त हैं जो अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में मत्था टेकते हैं, वहीं ऐसे भी श्रद्वालुओं की कमी नहीं, जो मनोकामना पूरी होने के बाद परिवार और अन्य मित्रों के साथ पहुंचते हैं। कालका जी मंदिर में यूं तो पूरे साल रोजा यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, मगर नवरात्र में यह तादाद लाखों में पहुंच जाती है, खासकर सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन तो मां के दर्शन करने के लिए देश के कोने कोने से श्रद्घालु अपने परिवार के साथ पहुंचते हैं।

नवरात्र के मौके पर 24 घंटे मंदिर में श्रद्घालुओं का आना जाना लगा रहता है। रात को पौने घंटे के लिए मंदिर के कपाट बंद किए जाते हैं। साढ़े बारह बजे कपाट खुलते हैं और एक बजे सुबह की आरती होती है। फिर दिन के साढ़े ग्यारह बजे माता का भोग लगाया जाता है। दोपहर तीन से चार बजे तक साफ सफाई के लिए श्रद्घालुओं को दर्शनों के लिए रोक है। उसके बाद शाम को साढ़े सात बजे आरती और फिर रात को पौने बारह बजे मंदिर के कपाट पौने घंटे के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

Leave a reply:

Your email address will not be published.

Site Footer