कलकत्ता से दिल्ली कैसे पहुंची अंग्रेज़ों की राजधानी, यहां पढ़ें

दिल्ली में चुनाव होने वाले हैं। इन चुनावों में कौन जीतेगा और कौन हारेगा ? किस पार्टी के मौजूदा हालात कैसे हैं ? वगरैह वगरैह। यह खबर आपको सभी तरह की मीडिया देगी। लेकिन आज हम आपको दिल्ली के उस इतिहास का परिचय कराएँगे, जिसे शायद ही कहीं आपने पढ़ा होगा। आज हम आपको बताएंगे की कैसे दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया गया ?

तो ऐसे बनी, दिल्ली भारत की राजधानी

वैसे तो, देश की राजधानी दिल्ली को किसी राजनेता ने नहीं, बल्कि 1911 में तीसरे और अंतिम दिल्ली दरबार में ब्रिटैन के राजा किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा के बाद बनाया गया था। ब्रिटिश राज में बना वो तीसरा दरबार इसीलिए ही बनाया गया था ताकि भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट करने की घोषणा की जा सके। कलकत्ता से दिल्ली को देश की राजधानी बनाने का फैसला बंगाल में जन्म ले रही राजनीति के प्रति सजगता को बताया जाता है। इसके अलावा कहा यह भी जाता है कि अंग्रेज़ मुस्लिम समुदाय को खुश करके अपने पाले में लाने के प्रयास में भी जुटे हुए थे।

जितना बड़ा फैसला उतना बड़ा इंतज़ाम

इतने बड़े देश की राजधानी बदलना कोई छोटा फैसला नहीं था। दरअसल, अंग्रेज़ों की 1772 से ही कलकत्ता राजधानी थी। ऐसे में खुद जॉर्ज पंचम ने ही जिम्मेदारी ली और भारत आने का फैसला किया। जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी के भारत आने के मौके पर मौजूदा दिल्ली के किंग्सवे कैंप में भव्य आयोजन की तैयारी की गई। इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए 20,000 हजार मजदूरों ने दिन रात काम किया। कई शिविर बनाये गए जिनमे मूलभूत सुविधाएं जैसे पानी, सड़क, खाने पीने की उचित व्यवस्था की गई।

मजूदरों ने उस वक़्त 80 किलोमीटर की पाइप लाइन बिछाने के साथ साथ 64 किलोमीटर की सड़क जैसे बड़े बड़े काम भी किए। कहा जाता है कि इस कार्यक्रम में 84,000 यूरोपियन और 233 भारतीयों ने हिस्सा लिया था। जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी के लिए बनाये गए इस भव्य आयोजन में उस वक़्त 6,60,000 पौंड का खर्च आया था। जबकि दूसरे दिल्ली दरबार में 1,48,000 पौंड का खर्च आया था। दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला हो चुका था, लेकिन उस दिल्ली को बनाना भी था, जिसकी जिम्मेदारी एडविन लुटियन और उनके दोस्त हर्बर्ट बेकर को दी थी। यह जानकारी इसलिए देना जरुरी है क्यूंकि, लुटियन दिल्ली नाम का आज भी जिक्र राजनितिक गलियारों में सुनाई पड़ता है। लुटियन ने रायसीना हिल्स पर वायसराय का बांग्ला तैयार किया, जोकि आज के वक़्त में राष्ट्रपति भवन कहा जाता है।

कुछ इसी तरह धीरे धीरे दिल्ली का निर्माण किया गया। दिल्ली को बाकि देश से जोड़ने के लिए नई रेलवे लाइन भी बिछाई गईं। लुटियन जोन में बने हर एक ईमारत का श्रेय एडविन लुटियन को ही दिया जाता है। इंडिया गेट से लेकर संसद भवन निर्माण भी एडविन लुटियन की ही देन है। कहा यह भी जाता है कि अगर विश्व युद्ध न छिड़ा होता तो दिल्ली को और भी भव्य बनाने का प्लानिंग अंग्रेजी शासक कर रहे थे।

 

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त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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