गंगा जी का तट हो और ईश्वर निकट हो

उत्तराखंड के चार मुख्य तीर्थस्थलों का एक मुख्यद्वार है हरिद्वार। शिवालिक पहाड़ियों की तहलटी में गंगा जी के किनारे बसा हरिद्वार, गंगा नदी का पहला पड़ाव पड़ता है। हरिद्वार तीर्थस्थलों का एक मुख्य शक्तिपीठ भी है। मान्यता है कि हरिद्वार वह जगह है जहां तीनों भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा का आशीर्वाद प्राप्त है। हरिद्वार में दिमाग, शरीर और आत्मा तीनों तृप्त हो जाते हैं और शांति प्राप्त कर शुद्ध हो जाते हैं। हरिद्वार सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिकता का सेंटर नहीं है बल्कि यह कला, सांस्कृतिक और साइंस का भी सेंटर है। यहां गुरुकुल की परम्परा से पढ़ाई करवाई जाती है। पढ़ाई की यह प्राचीन पद्धति हरिद्वार में प्रसिद्ध है।

हरिद्वार में आयुर्वेदिक पद्धति से रोग निवारण करने के संस्थान और परम्परा हैं। हरिद्वार भारत के उन प्राचीन और पहले शहरों में आता जो गंगा के पावन तट पर बसे हैं। यहां अभी भी चरों तरफ दरख्त और हरियाली की छट है। हरिद्वार का राजा जी पार्क वन्य जीव प्रेमियों के लिए उपयुक्त है। हरिद्वार शाम के समय और भी जगमग और चहलपहल वाला हो जाता है जब गंगा जी की तट पर गंगा मैया की आरती की जाती है। हजारों की संख्या में जलते हुए दीपक और गेंदे के फूल गंगाजी के धारा में प्रवाहित किए जाते हैं तो इसकी छटा अलग ही दिखाई देती है। हरिद्वार ही नहीं बल्कि इसके आस पास भी कई धार्मिक स्थल हैं जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचते हैं।

हर की पौड़ी : हरिद्वार की जान है हर की पौड़ी। हरिद्वार आकर अगर हर की पौड़ी की कुछ घंटे नहीं बिताए तो यहां आने का कोई फायदा नजर नहीं आता। हरिद्वार का यह घाट भारत के तमाम पवित्रम घाटों में सबसे पवित्र घाटों में से एक है। महा जाता है कि इस घाट का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भारतीहारि की याद में करवाया था। इस घाट को ब्रह्मकुंड भी कहा जाता है। हर शाम को यहां गंगा जी की आरती का दृश्य मन भावन होता है। यह एक ऐसा मंजर होता है कि यहां आने वाला या हरिद्वार के आस पास से शाम के वक्त गुजरने वाला कोई भी श्रद्धालु या पर्यटक देखे बिना नहीं रह सकता।

मनसा देवी : यह प्रसिद्ध मंदिर हरिद्वार में बिलवा पर्वत की चोटी पर स्थित है। मंदिर तक जाने के लिए पैदल रास्ता काफी अच्छा है। छोटी सी ट्रैकिंग भी हो जाती है। अगर जल्दी हो, थकान ने आ घेरा हो या फिर हरिद्वार और गंगाजी के दूर तक के नजारे लेने हो तो रोपवे से भी जाया जा सकता है। मंदिर के पास चाटी से हरिद्वार का नजारा मनमोहक होता है।

कांवड मेला : हिंदू माह श्रवण और फागुन में शिवरात्रि से पहले दस दिन के लिए यहां कांवड मेला लगता है। इसमें दूर दूर शिवभक्त आते हैं।

चंडी देवी : चंडी देवी का प्रसिद्ध मंदिर नील पर्वत की चोटी पर स्थित है। यह पर्वत गंगा जी के दूसरे किनारे पर खड़ा है। इस मंदिर को कश्मीर के राजा सुचेत सिंह ने 1929 ए.डी. में बनवाया था। चंडी देवी मंदिर तक जाने के लिए चंडी घाट से तीन किलोमिटर का ट्रैक है।

सप्त ऋषि : हरिद्वार में एक जगह गंगा जी खुद को सात छोटी छोटी धाराओं में बंट लेती है। इसलिए इस जगह को सप्त ऋषि नाम से जाना जाता है। यहां का नजारा भी देखने लायक है।

माया देवी : माया देवी भारत का एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। हरिद्वार के प्राचीन मंदिर माया देवी में अधिष्ठाति देवी की मूर्ति स्थापित है। मान्यता है कि भगवान शिव की पत्नी सती ने खुद को पति की इज्जत की खातिर खुद को जला लिया था। जब भगवान शिव सती के जले हुए शरीर को लेकर जा रहे थे तो यहीं सती का दिल और नाभि यहीं पर गिरे थे।

दक्ष महादेव मंदिर : हरिद्वार से चार किलोमीटर की दूरी पर है कनखल शहर। मान्यता है कि इस जगह का राजा राजा दक्ष प्रजापति था। राजा दक्ष की बेटी सती तप करके ने भगवान शंकर के साथ विवाह कर लिया था। राजा दक्ष बेटी के इस चयन और शादी से खुश नहीं थे। उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया और भगवान शिव को इसमें निमंत्रण नहीं दिया। इस यज्ञ में सती आई लेकिन उसके पिता ने उसकी बेइज्जती कर दी। यह बेइज्जती वह सहन नहीं कर सकी और उसने खुद को यज्ञ कुंड में जला दिया। यह सुनकर शिव भक्तों ने राजा दक्ष की हत्या कर दी। लेकिन महादेव ने दक्ष को जीवित कर दिया। यहां दक्ष मंदिर भी है और यह हरिद्वार की पवित्र जगहों में से एक है।

गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी : हरिद्वार ज्वालापुर बाईपास के पास स्थित है गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी। यहां प्राचीन गुरु शिष्य परम्परा को जीवित रखते हुए पढ़ाई करवाई जाती है। इंस्टीट्यूट में वेद मदिर नाम से एक म्यूजियम भी है। इसमें कई प्राचीन वस्तुएं वगैरह प्रदर्शित हैं।

नील धारा पक्षी विहार : पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों को देखने के लिए नील धारा पक्षी विहार काफी उपयुक्त स्थान है। सर्दियों में यहां पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां देखी जा सकती हैं। यहां गंगा जी के किनारे लालजीवाला में साइबेरियन सारस देखे जा सकते हैं।

ऋषिकेश : हरिद्वार से 24 किलोमीटर की दूरी पर है एक और पवित्र घाम ऋषिकेश। ऋषिकेश को तपोभूमि या आध्यात्मिक स्थल नाम से भी जाना जाता है। यह भी हिंदुओं का एक पवित्र तीर्थ है। यह वह जगह है जहां गंगा जी पर्वत से उतर का मैदान के लंबे सफर के लिए खुद को तैयार करती है। ऋषिकेश में उनफती गंगा जी पर झूलते पुल लक्ष्मण झूले से गंगा पार करना अलग ही रोमांस और अहसास करता है।

देहरादून और मसूरी : हरिद्वार और ऋषिकेश में धर्मकर्म करने के बाद अगर पहाड़ों पर छुट्टियां बिताने का भी मन है तो हरिद्वार से 54 किलोमीटर दूर स्थित देहरादून एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। देहरादून से 35 किलोमीटर की दूरी पर मसूरी भी जाया जा सकता है। देहरादून और मसूरी दोनों शिवालिक पर्वत श्रंखला पर स्थित हैं।

Image Source : Google

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