अमर शहीदों को श्रद्धांजली देती महान कवि ‘हरीओम पवार’ की यह कविता, जरूर पढ़ें

मै केशव का पाञ्चजन्य हूॅं, गहन मौन मे खोया हूं,

उन बेटो की याद कहानी लिखते-लिखते रोया हूं,

जिन माथे की कंकुम बिंदी वापस लौट नहीं पाई,

चुटकी झुमके पायल ले गई कुर्वानी की अमराई,

कुछ बहनों की राखी जल गई है बर्फीली घाटी में,

वेदी के गठबंघन मिल गये हैं सीमा की माटी में,

पर्वत पर कितने सिंदूरी सपने दफन हुए होंगे,

बीस बसंतों के मधुमासी जीवनहरण हुए होंगे,

टूटी चूड़ी, धुला महावर, रूठा कंगन हाथों का,

कोई मोल नहीं दे सकता बसंती जज्बातों का,

जो पहले-पहले चुम्बन के बादलाम पर चला गया,

नई दुल्हन की सेज छोड़कर युद्ध काम पर चला गया,

उसको भी मीठी नीदों की करवट याद रही होगी,

खुशबू में डूबी यादों की सलवट याद रही होगी,

उन आखों की दो बूंदों से सातों सागर हारे हैं,

जब मेंहदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं,

गीली मेंहदी रोई होगी छुप के घर के कोने में,

ताजा काजल छूटा होगा चुपके चुपके रोने में,

जब बेटे की अर्थी आई होगी सूने आंगन में..

शायद दूध उतर आया हो बूढ़ी मां के दामन में,

वो विधवा पूरी दुनिया का बोझा सर ले सकती है,

जो अपने पति की अर्थी को भी कंधा दे सकती है,

मै ऐसी हर देवी के चरणों में शीश झुकाता हूं,

इसीलिए मैं कविता को हथियार बना कर गाता हूं,

जो सैनिक सीमा रेखा पर ध्रुव तारा बन जाता है,

उस कुर्बानी के दीपक से सूरज भी शरमाता है

गरम दहानों पर तोपो के जो सीने आ जाते हैं,

उनकी गाथा लिखने को अम्बर छोटे पड़ जाते हैं

उनके लिए हिमालय कंधा देने को झुक जाता है

कुछ पल को सागर की लहरों का गर्जन रुक जाता है

उस सैनिक के शव का दर्शन तीरथ जैसा होता है,

चित्र शहीदो का मंदिर की मूरत जैसा होता है

जिन बेटों ने पर्वत काटे हैं अपने नाखूनों से,

उनकी कोई मांग नहीं है दिल्ली के कानूनों से

सेना मर-मर कर पाती है, दिल्ली सब खो देती है…..

और शहीदों के लौहू को, स्याही से धो देती है……

मैं इस कायर राजनीति से बचपन से घबराता हूँ…..

इसीलिए मैं कविता को हथियार बनाकर गाता हूँ।।

– डॉक्टर हरिओम पंवार (कवि)

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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