महक से सराबोर है बगीचों का शहर “मैसूर”

तमिलनाडु की सीमा के करीब कर्नाटक की राजधानी बंग्लूरू से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर कर्नाटक का दूसरा सबसे बड़ा शहर है मैसूर। हिंदुस्तान के दक्षिण इलाके में बसा यह शहर बगीचों का शहर कहलाता है। मैसूर का नाम जुबां पर आते ही दिलो दीमाग और वातावरण जैसे चंदन, चमेली, गुलाब और कस्तूरी से महक उठता है। मैसूर चंदन के अपने विशाल वनों, हाथियों, बगीचों और महलों के लिए प्रसिद्ध है।

चामुंडेश्वर मंदिर

मैसूर से 13 किलोमीटर दूर चामुंडा पहाड़ी मैसूर का एक प्रमुख पर्यटक स्थल है। इस पहाड़ी की चोटी पर देवी दुर्गा को समर्पित चामुंडेश्वरी मंदिर है। 12वीं शताब्दी में बनाया गया यह मंदिर देवी दुर्गा के महिषासुर पर विजय का प्रतीक है।

चामुंडेश्वर मंदिर में देवी मां के दर्शनों के लिए जाने के लिए एक हजार सीढि़यां चढ़कर पहुंचा जा सकता है और चाहें तो सड़क के रास्ते से भी मंदिर जाया जा सकता है। चामुंडा  हिल पर चढ़ाई अपने आम में आनंददायी और रोमांचक अनुभव है। रास्ते में हरेभरे पेड़ों के बीच खुशबू का झोंका ताजगी और उत्साह से भर देता है। गोपुरम तक पहुंचते ही सबसे पहले दर्शन होते हैं ठोस काले ग्रेनाइट से बने नंदी बैल के। पहाड़ की चोटी से मैसूर का मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता है।

मंदिर के मुख्य गर्भगृह में शुद्ध सोने से बनी देवी मां की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का एक अच्छा नमूना है। सात मंजिला इस मंदिर के ठीक पीछे महाबलेश्वर को समर्पित एक छोटा सा मंदिर भी है जो कि हजार साल से भी ज्यादा पुराना माना गया है। मंदिर के पास ही महिषासुर की विशाल प्रतिमा रखी हुई है।

मैसूर महल

मैसूर में आकर्षण का सबसे बड़े आर्कषण का केंद्र है मिर्जा रोड पर स्थित यह मैसूर महल। यह भारत के सबसे बड़े महलों में से एक है। इसमें मैसूर राज्य के वुडेयार महाराज रहते थे। जब लकड़ी से बना यह महल जल कर खाक हो गया, तब इसका पुर्ननिर्माण 1912 में फिर से करवाया गया। महल का नक्शा ब्रिटिश आर्किटैक्ट हेनरी इर्विन ने तैयार किया था। कल्याण मंडप की कांच से बनी छत,  दीवारों पर लगी तस्वीरें और सोने का सिंहासन इस महल की खासियत है।

मैसूर का यह महल जिसे महाराजा पैलेस के नाम से भी जाना जाता है, परीकथाओं जैसे अद्भुत सौंदर्य से समृद्ध है। इस महल के कारण ही मैसूर को ‘परियों का देश’ कहा जाता है। मैसूर पैलेस का अहम आकर्षण है पारंपरिक स्वर्ण सिंहासन। नाचते मयूर की आकृति का यह सिंहासन भारत की शक्ति और अधिकार का प्रतीक माना जाता था।

मैसूर पैलेस की छटा देखनी है तो शाम के समय देखें जब लगभग साढ़े तीन लाख बल्बों की रोशनी से पूरा पैलेस जगमगा उठता है और एकदम परीकथाओं के महलों की परिकल्पना साकार कर देता है।

मुख्य शहर के उत्तर पश्चिम में श्रीरंगपट्टनम में प्राचीन मैसूर का इतिहास जीवंत हो उठता है। यह तमिल सभ्यताओं के केन्द्र बिन्दु के रूप में स्थापित था। यहीं है टीपू सुल्तान की राजधानी। यहां से टीपू सुल्तान ने लगभग पूरे दक्षिण भारत पर शासन किया था। अठारहवीं शताब्दी के अंत में टीपू ने यहां अंग्रेजों से अंतिम लड़ाई लड़ी थी। श्रीरंगपट्टनम से सड़क की दूसरी ओर है दरिया दौलत बाग, टीपू सुल्तान का ग्रीष्मकालीन महल, गुंबज और संग्रहालय। दरिया दौलत बाग एक खूबसूरत बगीचा है, जिसमें स्थित संग्रहालय में रखी वस्तुएं टीपू सुल्तान की याद दिलाती हैं। विभिन्न चित्रकारों द्वारा बनाए गए टीपू सुल्तान और उसके परिवार के चित्रों, रेखाचित्रों के अलावा दीवारों पर बने अनेक चित्रों में टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के युद्ध के दृश्य अंकित हैं। यहां सुंदर, स्वच्छ और रंग बिरंगे फूलों से भरे बाग बगीचों की भरमार है। चामुडी पहाड़ी पर स्थित होने के कारण प्राकृतिक छटा का भरमार है।

चाणकेश्वर मंदिर

मैसूर से करीब 35-40 किलोमीटर दूर कावेरी नदी के किनारे बसा है सोमनाथुर। यहां का चाणकेश्वर मंदिर यहां का मुख्य आकर्षण है। इस मंदिर का निर्माण 1268 में होयसल सेनापति, सोमनाथ दंडनायक ने करवाया था। सितार के आकार के चबूतरे पर बने इस मंदिर को मूर्तियों से सजाया गया है। मंदिर वास्तु शिल्प का बेजोड़ नमूना है। इसकी दीवारों पर रामायण, महाभारत और होयसल राजाओं की जीवन शैली बहुत खूबसूरती से पत्थरों में उकेरी गई है। मंदिर में तीन गर्भगृह हैं। उत्तर में जनार्दन और दक्षिण में वेणुगोपाल की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मुख्य गर्भगृह में चाणकेश्वर की मूर्ति स्थापित थी किन्तु वह अब यहां नहीं है।

चिड़ियाघर

मैसूर का बादीपुर चिड़ियाघर दुनिया के सबसे पुराने चिड़ियाघरों में से एक है। इसका निर्माण 1892 में करवाया गया था। चिड़ियाघर में 40 से भी ज्यादा देशों से लाए गए जानवरों को रखा गया है। इसमें बारहसिंगे, चितकबरे हिरण, हाथी, सांभर, बाघ और तेंदुए हें। इसकी सैर जीप, ट्रक के अलावा हाथियों पर बैठ कर भी की जा सकती है। यहां के बगीचों को बहुत ही खूबसूरती से सजाया और संभाला गया है। शेर यहां के मुख्य आकर्षण हैं। इनके अलावा सफेद मोर, दरियाई घोड़े, गैंडे और गोरिल्ला भी यहां देखे जा सकते हैं। चिड़ियाघर में करंजी झील भी है जो रंगनायिट्टू पक्षी विहार के नाम से जानी जाती है। यहां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं। इसके अतिरिक्त यहां एक जैविक उद्यान भी है जहां भारतीय और विदेशी पेड़ों की करीब 85 प्रजातियां रखी गई हैं। जून से सितंबर तक यहां पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है।

वृंदावन गार्डन

कावेरी नदी पर बने कृष्ण सागर बांध से जुड़ा है वृंदावन गार्डन। 1932 में बना यह बांध मैसूर से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित है। इसका डिजाइन एम. विश्वेश्वरैया ने बनाया था और निर्माण कृष्णराज वुडेयार चतुर्थ के शासन काल में हुआ था। बांध की लंबाई 8600 फीट, ऊंचाई 130 फीट और क्षेत्रफल 130 वर्ग किलोमीटर है। यहां एक छोटा सा तालाब भी हैं जहां बोटिंग का मजा लिया जा सकता है। बांध के उत्तरी कोने पर दूसरा प्रमुख आकर्षण है पश्चिमी और भारतीय संगीत की लय पर थिरकते झूमते फव्वारे। पश्चिम में सूरज ढलते ही उधर आसमान में अंधेरा घिरने लगता है और इधर रंगबिरंगी रोशनियों में नहाए फव्वारे दिलकश संगीत के साथ कदम मिलाते झूमने लगते हैं।

सुगंध

अपने पर्यटन स्थलों के अतिरिक्त मैसूर जाना जाता है सुगंध के लिए। जब कभी चमेली, गुलाब, चंदन और कस्तूरी की महक आती है तो यादों में महक उठता है मैसूर। यह अगरबत्ती बनाने का सबसे बड़ा केंद्र है। मैसूर का चंदन तो बेजोड़ है ही। चंदन की लकड़ी पर पच्चीकारी में यहां के कारीगरों की कुशलता देखते ही बनती है। चंदन की लकड़ी के अलावा यहां के कारीगर हाथी दांत और रोजवुड पर भी बारीक और गजब की पच्चीकारी करते हैं। दुनिया के किसी हिस्से में लकड़ी और हाथी दांत पर ऐसी कारीगरी देखने को नहीं मिलती।

कलाओं की तरह मैसूर सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध है। मैसूर का दशहरा इसके सांस्कृतिक वैभव और लोक कलाओं का जीता जागता प्रमाण है। दशहरा उत्सव के दस दिनों में जैसे पूरा शहर उत्सव के माहौल में डूबा होता है। मैसूर को रेशम का शहर भी कहा जाता है, देश भर का 70 प्रतिशत से ज्यादा रेशम यहीं पैदा होता है।

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