​कभी मौसम विभाग का काम करता था जंतर—मंतर

दिल्ली के पग पग पर इतिहास बिखरा हुआ है. यहां अनेकों वंशों के राजाओं ने राज किया और अपने अपने अनुसार दिल्ली में इमारतें बनवाईं. आज हम उनमें से एक ऐसी इमारत का जिक्र आपसे करने जा रहे हैं, जिसमें वैज्ञानिकों के अनुसार यंत्रों का खेल छुपा हुआ है.

दिल्ली के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों में से एक है, जंतर—मंतर. यह दिल्ली के कनॉट प्लेस के बाहरी गोल चक्कर से संसद मार्ग पर मुड़ने के बाद पालिका बाजार के सामने ही दिखाई देता है. जंतर—मंतर एक तरह से आज दिल्ली के दिल में बसा हुआ है. हां​लाकि, इतिहास की बात करें जंतर—मंतर पहले दिल्ली — शाहजहांबाद के बाहरी हिस्से में था, जिसे जयपुर के राजा सवाई जयसिंह ने बनवाया था.

मुगल बादशाह औरंगजेब ने जयसिंह को सवाई की उपाधि दी थी. सवाई का अर्थ होता है — औरों से एक चौथाई अधिक कुशल व्यक्तित्व. जय सिंह ने दिल्ली के अलावा उज्जैन, मथुरा, वाराणसी और जयपुर में भी इसी तरह का जंतर—मंतर बनवाया था.

दिल्ली में बनाए गए जंतर मंतर में चार अलग—अलग किस्म के यंत्र लगे हुए हैं. इसलिए इसका नाम मिश्र यंत्र रखा गया है. इनमें से एक नियत चक्र मिश्र यंत्र के ठीक बीच में लगा हुआ है. इसके नीचे की दो सीढ़ियां के आस—पास की दीवारें सम्राट यंत्र के समानांतर और आधार से 28 डिग्री, 39 मिनट का कोण बनाए हुए है. इस यंत्र में चार गोलाकार पट्टियां हैं, जिन पर मपाक रेखाएं बनाई गई हैं. इस यंत्र का कमाल यह है कि यह दुनिया के चार जगहों पर जापान के नोटके, रूस के पूर्वी इलाके में ​सरिच्यु, ​स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख और इंग्लैंड के निकट ग्रीनविच के स्थानीय 12 बजे का समय बताता है. इस मिश्र यंत्र में कई और गणितीय विभाजन वाली खगोलीय बातों का पता लगाया जा सकता है.

सम्राट यंत्र

यह जंतर मंतर का सबसे उंचा निमार्ण है. यह सबसे ​अधिक जगह में भी फैला हुआ है. यह 62 फीट से अधिक उंचा है और इसकी चौड़ाई—लंबाई 126 फीट और 115 फीट है. इसके बीच का भाग एक समकोणीय त्रिभुज के आकार का है.

राम यंत्र

यह यंत्र इस इमारत के दक्षिणी भाग में मौजूद है. दो गोलाकार वाली दीवारों वाले इस यंत्र का व्यास साढ़े 24 फीट है. एक दूसरे को विभाजित करता हुआ भी यह एक दूसरे के पूरक है. इस यंत्र की स्थापना दिन के समय सूर्य की स्थिति और रात को आकाशीय पिंडो की गणना करने के लिए किया गया था.

जयप्रकाश यंत्र

यह यंत्र सम्राट यंत्र के​ ​दक्षिणी हिस्से की तरफ बनाया गया है. इसमें दो अर्धव्रत हैं जो एक दूसरे के पूरक हैं. साढ़े 27 फीट व्यास वाले इन अर्धव्रंतों के अंदर के भाग को कई खंडों में विभाजित किया गया है. जय प्रकाश यंत्र से आकाशीय पिंडों का नि​रीक्षण किया जाता था. इससे भी दिन में सूर्य की ओर रात में तारों की​ स्थिति का पता लगाया जाता था.

गार्ड हाउस

इसमें चारों तरफ गार्ड हाउस बनाया गया है. इसका डिजाइन कुछ इस तरह से किया गया है कि इसके मंडप के अंदर हवा को बहुत धीमी गति से महसूस किया जाता है. इसका प्रयोग साल में 2 दिन एक बार दीवाली से तीसरे दिन और मकर संक्राति के दिन जनवरी में बहती हवा, तापमान, गति और दिशा का अनुभव कर अगले छह महीनों के मौसम के पुर्वानुमान के लिए किया जाता था. आज भी आप इसकी मदद से यह गणना कर सकते हैं.

मंडप

जंतर मंतर में बने दो स्तंभों पर गणना के लिए किसी यंत्र को रखा गया होगा. इनके बीच का फासला 15 फीट से कुछ अधिक है. आज यों तो इन सभी यानी मौसम और खगौल की जानकारी के लिए आधुनिकतम मशीनें हैें. पर करीब 200 साल पहले इस तरह की इमारत का निर्माण अजूबा ही कहा जाएगा.

साथ ही इसे बनवाने के लिए बुद्धि की दाद दिए बिना भी आप नहीं रह सकते. आज तो यह सिर्फ धरना और प्रदर्शन का केंद्र बन चुका है.

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