भारत गुलाम था, ले​किन दिल्ली 133 दिन आजाद रही थी

26 जनवरी हो या फिर 15 अगस्त. देश की आजादी से जुड़ा हर किस्सा दिल्ली की फिजाओं से होकर जाता है. आज मौका है, दस्तूर है तो क्यों ने देशभक्ति के इस माहौल में दिल्ली के उस दिलचस्प इतिहास को आपके साथ सांझा करें, जब देश अंग्रेजों का गुलाम तो था, लेकिन दिल्ली 133 दिन तक आजाद थी.

जी हां, साल 1857 में देश की आजादी की पहली क्रांति के वक्त दिल्ली की गद्दी 133 दिन तक सुनसान रही थी. चलिए आपको बताते हैं पुराना किस्सा….

यह दौर था साल 1857 का. 11 मई का दिन था और सुबह मंगल पांडे द्वारा लगाई गई देश की आजादी की वो आग दिल्ली तक पहुंच चुकी थी. मेरठ, बेरली और अन्य जगहों से करीब 40 हजार विद्रोही सैनिकों की फौज दिल्ली पहुंच चुकी थी. इन सैनिकों ने सीधे बहादुरशाह जफर से संपर्क साधा और उनसे कहा कि वह बागी सैनिकों के सरदार बनें. करीब 82 साल के बहादुरशाह ने उस समय कुछ नहीं कहा. लेकिन विद्रोही सैनिकों के बार—बार आग्रह करने पर उन्होंने हामी भर दी, लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में बोल दिया कि उनके पास न तो पूंजी है और ना ही शक्ति. लेकिन सैनिकों के तो बस एक सरदार की दरकार थी.

किले में मौजूद बहादुरशाह जफर के पोते और अन्य लोगों ने भी बागी सैनिकों का साथ दिया. दिल्ली में आजादी के लिए उसी दिन विद्रोह फैल गया. करीब 50 लोगों को बहादुरशाह जफर के नौकरों ने महल के बाहर ही मार डाला. दिल्ली पर राज कर रहे अंग्रेजों में हाहाकार मच गया. सब अपने परिवारों को लेकर दिल्ली छोड़ छोड़कर भागने लगे. दिल्ली के पास ही बंगाल नेटिव इंफैंट्री की तीन बटालियन मौजूद थीं. बटालियन के कुछ दस्ते फौरन ही विद्रोहियों के साथ मिल गए. दिल्ली को अंग्रेजों से पूरी तरह आजाद करा लिया गया. अंग्रेज और उनके लिए काम करने वाले दिल्ली छोड़कर पंजाब की ओर भाग गए. अगले दिन बहादुरशाह ने कई वर्षों बाद अपना पहला आधिकारिक दरबार लगाया. बहुत से सिपाही उसमें शामिल हुए. बहादुरशाह इन घटनाओं से चिन्तित थे. मगर फिर भी उन्होंने बागी सैनिकों और दिल्ली के लोगों में खुलकर समर्थन कर एलान कर दिया. दिल्ली में अचानक घटी घटनाओं की खबर तार के जरिए तेजी से पूरे देश में फैल गई. जिसका नतीजा ये हुआ कि अलग अलग हिस्सों में इसी तर्ज पर विद्रोह भड़कने लगा.

दिल्ली को 133 दिन तक सैनिकों के साथ — साथ आजाद रखने में पुरानी दिल्ली के सेठों का भी पूरा योगदान रहा था. इतिहास के पन्नों में इस बात का जिक्र है कि जिस वक्त विद्रोह अपनी चरमसीमा पर था, उस वक्त ​पुरानी दिल्ली के सेठों ने विद्रौही सैनिकों के ठहरने, उनके खाने—पीने, कच्चे राशन, जरूरी दवाईयों आदि के लिए अपनी तिजोरियां खोल दी थीं. जिससे जो भी बन सकता था, उसने किया था. ताकि बागी सैनिकों का मनोबल न कमजोर हो. ज्यादातर कारोबारी खुद ही थाने पहुंचकर सामान, कैश या कपड़ा दे कर आते थे. उस दौर में पुरानी दिल्ली के सेठों ने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जमकर मुकाबला किया था.

जानकारी के लिए आपको एक ओर बात बताते हैं. उस समय 21 थानों के थानेदार को कोतवाल हैंडल किया करता था. कोतलवाल के उपर कमांडर इन चीफ हुआ करता था और उसके उपर सबसे बड़ा राजा को माना जाता था. बहादुरशाह जफर उन दिनों प्रशासन के साथ पुलिस के भी मुखिया हुआ करते थे.

दिल्ली पर हुए कब्जे की बात सुनकर अंग्रेज अपने परिवार और नौकरों के साथ सुरक्षित ठिकानों की ओर चले गए थे. लेकिन कुछ महीने बाद यानी 20 सिंतबर को पंजाब के चीफ कमिश्नर ज्हान लॉरेंस की अगुवाई में पंजाब से आए अंग्रेज सैनिकों ने कश्मीर गेट से दाखिल होकर अचानक दिल्ली पर धावा बोल दिया. दिल्ली पर कब्जा पाने के लिए अंग्रेज अपने साथ तोप लाए थे, जिसे उन्होंने कश्मीरी गेट के नजदीक लगाकर लाल किले के परिसर में रह रहे विद्रोहियों पर चलवाया. जहां तोप रखी गई थी, उस जगह को आज अजित गढ़ के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजों ने अपनी पूरी ताकत के साथ दिल्ली को फिर कब्जे में ले लिया.

133 दिनों तक दिल्ली को अंग्रेजों से आजाद रखना कोई आसान बात नहीं थी. अकेले मंगल पांडे ने अंग्रेजी हुकुमत ​को अंदर तक हिला दिया था. देश की आजादी के पहले संग्राम की यह अनसुनी कहानी आपको कैसी लगी, कॉमेंट बॉक्स में जरूर बताइए.

 

 

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