जब गुपचुप तरीके से भारत ने किया था – परमाणु परिक्षण

साल था 1998. भारत अपना दूसरा परमाणु परिक्षण करने जा रहा था. उस वक़्त भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे. भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका था, जो लगातार अपनी एजेंसियों के माध्यम से भारत पर पहले परमाणु परिक्षण के बाद से निगरानी रख रहा था. भारत में एक परिक्षण साल 1974 में हो चुका था.

जानिए पूरी कहानी :

साल 1966 में चीन के एक और परमाणु परिक्षण के बाद भारत पर दवाब महसूस हुआ तो भारत ने भी साल 1974 में अपना पहला परमाणु परिक्षण किया. इस मिशन का नाम – इस्माइलिंग बुद्धा रखा गया. इसके बाद इंदिरा गाँधी की सरकार ने काफी समय तक वैश्विक दवाब के चलते दुबारा परमाणु परिक्षण करने से इंकार किया। हालांकि, पाकिस्तान की नापाक हरकतों के जवाब में इस पर विचार हुआ और स्वर्गीय डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में परमाणु परिक्षण करने की तैयारी शुरू हुई.

इस बार भारत को दुनिया की महाशक्तियों से छुपकर यह परिक्षण करना था. अमेरिका अपनी ख़ुफ़िया एजेंसियों के माध्यम से भारत पर निगरानी कर रहा था. भारत ने राजस्थान स्थित पोखरण में परीक्षण को पूरी तरह गोपनीय रखने का फैसला किया, ताकि अन्य देशों द्वारा पता लगाने की संभावना से बचा जा सके। इसके लिए बाकायदा एक एजेंसी को अमेरिकी उपग्रहों पर नजर रखने के लिए तैनात किया गया था. इसके अलावा जमीनी स्तर पर मिशन को गोपनीय बनाने के लिए कुछ ही वैज्ञानिकों, सैन्य अधिकारीयों और नेताओं को ही शामिल किया गया. इस मिशन की खबर सरकार में मौजूद कई अधिकारीयों को भी नहीं थी.

उस वक़्त मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार और डीआरडीओ के निदेशक रहे डॉ अब्दुल कलाम और परमाणु ऊर्जा विभाग के निदेशक रहे डॉ आर चिदंबरम को इस परिक्षण का मास्टर प्लानर बताया जाता है. कहा जाता है कि परमाणु परिक्षण की खबर अगर अमेरिका को पता लग जाती, तो कई देश उस वक़्त भारत पर हमला तक कर सकते थे. ऐसे में वाजपेयी का यह निर्णय बेहद हिम्मती बताया जाता है.

सिर्फ इजराइल ने किया था भारत का समर्थन :

5 परमाणु बमों का एक परिक्षण के बाद दुनिया के देशों ने भारत की भरपूर आलोचना की थी. अमेरिका इस बात से नाखुश था कि वो अपनी जासूसी में कामयाब नहीं हो पाया था, तो जापान, चीन, कनाडा जैसे देशों ने भी कई प्रतिबंध भारत पर लगा दिए थे. चीन ने तो सयुंक्त राष्ट में दुनिया को भारत के खिलाफ खड़ा करने की भरपूर कोशिश की थी. पाकिस्तान तो बोखला कर भारत से बराबरी की बात करने लगा था. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भारत को करारा जवाब देने की बात कह दी थी.

हालांकि फ्रांस, रूस जैसे देशों ने भारत की निंदा करने से परहेज किया था तो इजराइल ने खुलकर समर्थन किया था. भारत पर कुछ देशों ने प्रतिबंध जरूर लगाए थे, लेकिन अमेरिका समेत सभी देशों के प्रतिबंध लगभग 5 साल के भीतर वापस ले लिए गए थे. अब भारत एशिया में एक प्रमुख शक्ति बनकर उभरा था. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस का नाम दिया था।

इतिहास के इस पन्ने को और भी विस्तार और रोमांच के साथ देखना चाहते हैं, तो आप जॉन अब्राहिम की फिल्म पोखरण देख सकते हैं.

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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