मिट रहा है दिल्ली गेट !

आज से पच्चीस साल पहले दिल्ली की आब-ओे-हवा ताजगी भरी होती थी। सड़कों पर इतना ट्रैफिक नहीं होता था। पुरानी दिल्ली में बाग ही बाग थे। जहां अब दिल्ली गेट चौराहा है वहां पहले गोल चक्कर था। चारों तरफ सड़क और बीच में बाग। इस बाग को गोल बाग कहते थे। बाग के बीच में आसफ अली की मूर्ति लगी हुई थी।

बच्चे उस बाग में और आसपास के दूसरे बागों में खेल खेलने आते थे। बुजुर्ग ताश खेलने, धूप सेकने और घूमने। सड़क पर ट्रैफिक बहुत कम होने से बच्चे कभी भी बाग में आ जाते थे। प्रदूषण भी न के बराबर था। इस बाग के एक तरफ ओपन एयर रेस्टोरेंट हवा महल था। मध्य जिला पुलिस उपायुक्त के दफ्तर के साथ दिल्ली गेट की दीवार के साथ सटा यह रेस्त्रां दो-एक साल में ही बंद हो गया। इसमें एक करीब 25 फिट ऊंचा झरना भी हुआ करता था।

आस-पास के लोगों की गर्मियों की शामें बाल-बच्चों सहित इन बागों में बीतती थीं। पापड़, गोलगप्पे और आइसक्रीम का मजा लिया जाता। बाग में मालिश करने वाले घूमते। लोग मालिश करवा कर दिन भर की थकान मिटाते। उस समय केवल क्वालिटी आइसक्रीम की रेहड़ियां ही दिखाई देती थीं।

1982 में एशियन गेम्स दिल्ली में हुए थे। इस कारण गोल बाग को हटा दिया गया और यहां पर चौराहा बना दिया गया। आसफ अली की मूर्ति की जगह बदल दी गई। जिस खम्भे पर मूर्ति 20 साल पहले विराजमान थी वह पत्थर अभी भी वहीं चौराहे के पास सड़क किनारे अपने इतिहास की दास्तान कह रहा है।

इस बाग के एक तरफ अजमेरी गेट की तरफ जाने वाले रास्ते पर इर्विन अस्पताल (आज का एलएनजेपी) के सामने भी एक लंबोतरा बाग था। यह बाग दिल्ली गेट से शुरू होकर डिलाइट सिनेमा हाल, तुर्कमान गेट तक फैला हुआ था। अब इस बाग की जगह निगम की पार्किंग और बैंक्वेट हाल नजर आता है।

दिल्ली गेट से आईटीओ तक के रास्ते में सैकड़ों साल पुराने पेड़ थे। जिनमें से कइयों को बढ़ती आबादी, बढ़ता ट्रैफिक लील गया। बरसात एक-दो दिन नहीं पूरे पूरे महीने होती थी। तब उन नीम के पेड़ों से निकलने वाली महक सराबोर कर देती थी।

मौलाना आजाद मेडिकल कालेज और उसका कैंपस भी चारों तरफ लोहे की चारदीवारी से घिरा हुआ नहीं था। इस बीच अस्पताल में भी कई बार बदलाव हो चुका है और होता जा रहा है। खूनी दरवाजा, जहां अब लोहे की बड़ी और ऊंची रेलिंग लगा दी गई है, इस पर चढ़ कर कोटला फिरोजशाह में होने वाले मैच को देखने का लुत्फ ही अलग था। हालांकि यहां पुलिस तब भी तैनात रहती थी, लेकिन वे किसी को टोकते नहीं थे। खूनी दरवाजे पर ज्यादातर वही लोग होते थे जो यहां से गुजरते हुए थोड़ी देर रुक कर क्रिकेट का मैच देखने की तमन्ना पूरी कर लेना चाहते थे।

मैदान के पास कोटला फिरोजशाह के खंडहरों की दीवारों पर चढ़ कर इमली खाना और मैच देखना भी होता रहता था। अब तो डीडीसीए की इमारत ही इतनी ऊंची कर दी गई है कि मैदान के भीतर का कुछ भी देख पाना नामुमकिन है।

दिल्ली गेट से राजघाट जाने वाले रास्ते में गंदे नाले के ऊपर जहां अब बाबू जगजीवन राम की समाधि समता स्थल है, वहां एक नहर बहती थी। यह नहर गांधी समाधि के पीछे होती हुई यमुना तक गई थी। अब यहां न पानी है और न नहर रही। यहां आने के बाद अब लगता ही नहीं कि यह वही इलाका है जो कुछ साल पहले हमारी आंखों के सामने हुआ करता था।

अब तो दिल्ली गेट चौक पर भी फ्लाई ओवर बनाने की योजना है। इससे बची-खुची हरियाली के भी गायब हो जाने की आशंका है।

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