"Bhakt" Modi Ke Samarthako ko Kyu Kaha Jata Hai "Bhakt" | Night Bulb-Hindi Blog

मोदी के समर्थकों को क्यूं कहा जाता है ‘भक्त’

हिंदू धर्म में भगवान के अनुयायी को भक्त कहा जाता है। धर्मग्रंथ गीता में श्रीकृष्ण ने भी चार तरह के भक्त का वर्णन किया है, जिनमें श्रीकृष्ण ने ज्ञानी को ही सबसे बड़ा भक्त कहा है। लेकिन आज के वक्त में भक्त का अर्थ बदल चुका है। नरेंद्र मोदी के विरोधियों ने भक्त की अलग परिभाषा तय की है। परिभाषा के अनुसार, जो भी व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष की बात कहेगा, उसे “Bhakt” कहा जाएगा। यह शब्द सोशल मीडिया पर बेहद पॉपुलर है।

आज हम आपको बताएंगे कि सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी के ही समर्थकों को ही भक्त क्यूं कहां जाने लगा है? बाकी नेताओं के समर्थकों को सोशल मीडिया पर क्या कहा जाता है? आइए जानते हैं।

“Bhakt एक ऐसा शब्द है, जिसका सीधा अर्थ यह होता है कि वह इंसान अपने भगवान पर पूर्ण विश्वास करता है और किसी के मुंह से भी भगवान के प्रति अपशब्द नहीं सुन सकता। श्रीकृष्ण ने भी गीता में चार प्रकार के Bhakt का वर्णन किया है। इनमें अर्थार्थी भक्त, आर्त भक्त, जिज्ञासु भक्त और ज्ञानी भक्त हैं। इनमें ज्ञानी भक्त को श्रीकृष्ण ने सबसे बड़ा भक्त बताया है। ज्ञानी वे भक्त होते हैं, जो बिना किसी सुख-भोग की मांग किए अपने भगवान की पूजा करते हैं।”

आइए जानते हैं क्या कहते हैं Bhakt शब्द को लेकर विरोधी और मोदी समर्थक

Modi Favour : नरेंद्र मोदी एक हिंदू नेता हैं और राष्ट्र स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं। यह नरेंद्र मोदी के समर्थकों को भक्त कहे जाने की सबसे बड़ी वजह है। नरेंद्र मोदी देश के एकमात्र नेता हैं, जिनके समर्थकों को Bhakt कहा जाता है।

 

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Against Modi: नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी कहे जाने पर समर्थक अपना धेर्य खो बेठते हैं, जिस कारण उन्हें Bhakt कहा जाता है। जैसे एक Bhakt भगवान के खिलाफ नहीं सुन सकता, वैसे ही मोदी समर्थक नरेंद्र मोदी के खिलाफ नहीं सुनते।

Modi Favour : उन्हें भक्त कहे जाने पर कोई आपत्ति भी नहीं है। वे कम से कम अंध Bhakt या चमचे नहीं है। कांग्रेस व अन्य दलों ने इतने घोटाले किए हैं, जिन्हें गिना नहीं जा सकता। उसके विपरित मोदी ने देश का नाम रोशन किया है और गरीबों के लिए कई योजनाएं भी लाएं हैं। मोदी के कार्यकाल में एक भी भ्रष्टाचार नहीं आया है। जो आरोप लगे वे सिर्फ झूठ हैं, जोकि साबित नहीं हो रहे हैं।

Against Modi : मोदी समर्थक एक शब्द भी मोदी के खिलाफ सुनना पसंद नहीं करते। वे बिना सोचे मोदी के खिलाफ बोलने वाले पर किचड़ उछालते हैं और उनको कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टी का खरीदा हुआ समर्थक मानते हैं।

Modi Favour : इस देश का दुर्भाग्य ही यही है कि कांग्रेस जैसी पार्टी अस्तित्व में आई। कांग्रेस ने हमेशा खरीदे हुए या लोभी समर्थक ही पाए हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं बिल्कुल सही है कि ये लोग दिल से समर्थक नहीं है और कांग्रेस की पब्लिसिटी करने में भरोसा रखते हैं। इन्हें सोशल मीडिया पर अंध भक्त या चमचे कहा जाता है।

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Against Modi : मोदी के समर्थक खुद को राष्ट्रीय समझते हैं और अन्य लोगों की राष्ट्रीयता पर उंगली उठाते हैं। इसका सीधा मतलब यही होता कि मोदी के खिलाफ कुछ न कहें।

Modi Favour : मोदी की छवि को बेवजह गंदा करना भी उचित नहीं है। विपक्षी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी जैसे देश के हित के मुद्दों को लेकर वे मोदी के खिलाफ बोलते-बोलते वे भारत के खिलाफ बोलने लग जाते हैं। समर्थक कहते हैं कि वे कम से कम नेहरू परिवार के समर्थक नहीं है, जो बर्दाशत भी नहीं करते और 1984 जैसे दंगे करा देते हैं।

Against Modi : विरोधी कहते हैं कि आप किसी भी समर्थक के मुंह पर उन्हें मोदी का भक्त बोल दो, वह बड़ी जल्दी बुरा मान जाते हैं। यही वजह है कि मोदी के समर्थक भक्त शब्द को गाली समझ बेठे हैं।

Modi Favour : समर्थक कहते हैं कि ये तो वही बात हो गई है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 67 सीटें मिलीं, लेकिन जैसे-जैसे केजरीवाल की असली छवि सामने आई तो हर किसी के मुंह से यही सुनने को मिलता था कि उन्होंने केजरीवाल को वोट नहीं दिया।

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बाकी नेताओं को समर्थकों को क्या कहा जाता है

सोशल मीडिया अब राजनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। जहां एक तरफ मोदी के समर्थकों को Bhakt कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर, कई अन्य पार्टियों के समर्थकों को भी कई नाम दिए गए हैं। सोशल मीडिया पर कांग्रेस के समर्थकों को अंध Bhakt या चमचा कहा जाता है। आम आदमी पार्टी के समर्थकों के लिए AAPtards और AAPiye कहा जाता है। वहीं कम्यूनिस्ट, टीएमसी, लेफ्ट पार्टियों के समर्थकों को देशद्रोही और पाकिस्तानी तक कहा जाता है।

Image source : www.quora.com, www.swarajyamag.com

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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