जानिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर आपका शहर क्या कहता है

देश भर में बढ़ता प्रदूषण और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तेजी से बढ़ती संख्या पर हाल ही में केंद्र सरकार ने एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट सर्वे के द्वारा बनाई गई है, जिसमें काफी चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। दरअसल, हम सोचते हैं कि लोग अपने व्हीकल से सफर करना ज्यादा मुनासिब समझते हैं, लेकिन ऐसा कतई नहीं हैं।

स्टडी में कहा गया है कि मेट्रो सिटी यानी भारत के बड़े – बड़े शहर जानबूझकर अपनी गाड़ी नहीं निकालते। अगर उनके शहर में उनके राज्य की सरकारें पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा अच्छी कर दे, तो वे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करना ज्यादा अच्छा मानेंगे।

इस रिपोर्ट के अनुसार, 80 पर्सेंट शहर की जनसंख्या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करने चाहती है। हालांकि, काफी हद तक कई सरकारें आम लोगों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तरफ खींचने में कामयाब रही हैं। कोलकाता इसमें सबसे आगे है, जबकि दिल्ली दूसरे नंबर पर सबसे अधिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करती है। दिल्ली के बाद चैन्नई, हैदराबाद, बैंगलुरू और छठे नंबर पर मुंबई है।

दूसरी ओर, सैकंड कैटेगरी के शहरों में बिहार की राजधानी पटना सबसे ऊपर है, जिसके बाद गुजरात के शहर सूरत उसके बाद अहमदाबाद, भोपाल, जयपुर, इंदौर और कौच्चि हैं। भुवनेश्वर को तीसरी कैटेगरी में सबसे ऊपर की जगह हासिल हुई है। इसके बाद कोहिमा, मैसूर, जम्मू, नंदिद और जबलपुर हैं।

यह रिपोर्ट जारी होने के बाद केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि सरकार पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के साथ- साथ प्राइवेट व्हीकल को कम करना चाहती है। गडकरी ने कहा कि आने वाले तीन से चार साल के भीतर आज की तुलना में टैक्सियों की संख्या में तीन गुना इजाफा होगा। आज देश भर में 35 लाख टैक्सियां चल रही हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, यह जानकारी लगभग 45 हजार लोगों से ली गई है, जोकि देश के 20 शहरों में रहते हैं। 60 पर्सेंट लोगों का मानना है कि अगर ट्रांसपोर्ट ठीक हो तो वे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही सफर करना चाहेंगे। रिपोर्ट मे ंसुझाव भी दिए गए हैं कि टैक्सी, थ्री-व्हीलर और ई-रिक्शा एक बेहतर साधन हो सकते हैं, ताकि लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा उपयोग करें।

 

Image Source : www.calcuttanews.tv

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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