Yaha Jakar Dekhna Chor Denge Switzerland Jane Ke Sapne | NightBulb

यहां जाकर देखना छोड़ देंगे स्वीटरजलैंड जाने के सपने

रोज-रोज की भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, कुछ दिनों के लिए बाहर घूम आना किसे पसंद नहीं आएगा| हम लोग भी काफी समय से कहीं बाहर नहीं गए थे, तो सोचा चलो पहाड़ों पर किसी खूबसूरत जगह जाने का कार्यक्रम बनाया जाए। वैसे, तो हम पहाड़ों की कई बार सैर कर चुके थे, पर अब ऐसी जगह जाने का मन था, जहां की संस्कृति, भाषा, खान पान सब कुछ यहां से बिल्कुल अलग हो। थोड़ा विचार करने के बाद कार्यक्रम बना सिक्किम जाने का और निकल पड़े अपनी मंजिल, सिक्किम की राजधानी गंगटोक के लिए।

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सिक्किम की राजधानी गंगटोक

गंगटोक पहुंचते ही हमें मिला स्वच्छ शीतल हवा का एहसास, मंत्रमुग्ध कर देने वाले अद्भुत नजारे, ऊंचे ऊंचे पर्वतों की चोटियां और खूबसूरत जगह के साथ-साथ साफ सुथरा वातावरण। यहां पर कई भाषाएं बोली जाती हैं जिनमें नेपाली, अंग्रेजी, भूटिया, लिंबू और हिंदी प्रमुख भाषाएं हैं, लेकिन लिखित व्यवहार में अंग्रेजी का ही उपयोग अधिक होता है| यहां हिंदू तथा बज्रयान बौद्ध धर्म प्रमुख हैं| गंगटोक में माघे संक्रांति, भीमसेन पूजा, द्रुपका तेशी, लोसर, बुम्चु, सगा दावा और लूसांग यहाँ के स्थानीय बौद्ध सिक्किमी द्वारा मनाये जाने वाले कुछ परंपरागत त्यौहार हैं| इनहेंची मठ पीले, लाल, नारंगी, नीले रंगों से सजी हुई मोनेस्ट्री है छोटी, लेकिन सुसज्जित और साफ सुथरी|  स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत किए गए सर्वे में इस छोटे से राज्य को पांच बार स्वच्छता के लिए सरकार ने पुरस्कृत किया है जिसमें देश के 26 अन्य राज्य शामिल थे। सिक्किम देश का पहला राज्य है जिसने खुले में शौच की प्रथा को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। यहां पर भारत का बॉर्डर है, तो आपको मार्ग में पहाड़ों पर कुछ दूर “मेरा भारत महान” लिखा हुआ दिखाई देता है।

इस छोटे से परिचय से आपको समझ आ रहा होगा कि सिक्किम की राजधानी गंगटोक आखिर है कैसा। चलिए आपको अब गंगटोक की सही तरीके से सैर कराते हैं।

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रुमटेक मठ

रुमटेक सिक्किम का सबसे पुराना मठ है, करीब 300 वर्ष पुराना। रुमटेक घूमे बिना गंगटोक का सफर अधूरा माना जाता है। यह मठ देख कर सचमुच कुछ देर के लिए देखने वाला ठगा सा रह जाता है। हरे भरे पहाड़ों से घिरा, मोहमाया से दूर। अद्भुत छटा बिखेरती रंग बिरंगी झंडियां, लाल, नीले, हरे रंगों से बनी हुई पेंटिंग्स।
जैसे जैसे मठ की ओर बढ़ते जाते हैं जगह-जगह लगे प्रार्थना चक्र और प्रार्थना झंडियों को देख उत्सुकता और भी बढ़ती जाती है। साफ सुथरा और भक्तिमय वातावरण, पवित्रता और शांति का अहसास करवाता यह अद्भुत विशाल मठ।

इस मठ के अस्तित्व का इतिहास काफ़ी दिलचस्प है। चीन द्वारा तिब्बत को जीत लेने के बाद 16वें कर्मापा यानि कर्मा कग्यु वंश के प्रधान, तिब्बत से भाग कर भारत आ गये। पूरे भारत में उन्होंने रुमटेक को अपने निर्वासन के लिए चुना। रुमटेक मठ को धर्म चक्र केंद्र के नाम से भी जाना जाता है। अंदर एक सोने का स्तूप है। कहते हैं इसमें 16वें कर्मापा के अवशेष हैं। इस पूरे मठ के परिसर में एक तीर्थ मंदिर, एक मुख्य मठ, एक रिट्रीट सेंटर, एक संरक्षक मंदिर, भक्तों के लिए धर्मशाला, मठवासियों के लिए विद्यापीठ और कुछ प्रतिष्ठानों के लिए कई संस्थाएँ भी देखने को मिलीं।

ठेठ तिब्बत्तन आर्किटेक्चर के स्टाइल में अंदर भित्तिचित्र, फ्रेस्कॉस, हस्त चित्रकारी और मूर्तियों की कलाकारी बहुत ही खूबसूरत और आश्चर्यचकित कर देने वाली थी| चार मंजिला यह मंदिर और इसके ऊपर स्थापित एक स्वर्ण मूर्ति, जो इसकी शोभा बढ़ाती है। इस मंदिर को इस तरह बनाया गया है जो भगवान बुद्ध के पांच परिवारों को दर्शाता है। मठ के अंदर स्थापित भगवान बुद्ध की प्रतिमा सचमुच अद्भुत कलाकृति है। यहां रोज सुबह बौद्ध भिक्षुओं द्वारा की जाने वाली प्रार्थना बहुत कर्णप्रिय होती है।

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हनुमान टोक

गंगटोक से लगभग नौ किलोमीटर दूर है हनुमान जी का मंदिर। यहाँ पर हनुमान जी का मंदिर तो है ही साथ में श्रीराम जी, लक्षमण जी और माता जानकी जी का भी मंदिर है। ऐसा माना जाता है की लक्ष्मण जी को जीवित करने के लिए हनुमान जी हिमालय से जब संजीवनी बूटी लेकर लंका जा रहे थे, तब कुछ देर आराम करने के लिए इसी स्थान पर रुके थे। इस मंदिर का रख रखाव भारतीय सेना और स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता है।

गणेश टोक

हनुमान जी के दर्शन के बाद आता है भगवान गणेश का मंदिर जिसे गणेश 8टोक कहते हैं| तीन किलोमीटर के पहाड़ी सफ़र के बाद गणेश टोक पहुँचा जा सकता है। गंगटोक-नाथुला मार्ग पर मुख्य गंगटोक शहर से गणेश टोक लगभग सात किलोमीटर दूर है| यहाँ पर छोटी सी पहाड़ी पर हिंदू धर्म के प्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश जी मंदिर बना हुआ है। पहाड़ और हरियाली के बीच ठंडी हवा के झोंके और बारिश की बूंदों से एक रूहानी सा अहसास चारों तरफ बिखरा हुआ था।
यहाँ पार्किंग के पास से मंदिर तक जाने का रास्ता एक सुन्दर द्वार से होकर जाता है, जो संभवत: सिक्किम शैली में बनाया गया है| षठकोणीय आकार का रंग बिरंगा यह एक छोटा मंदिर, जहाँ कुछ लोग ही एक साथ मंदिर में प्रवेश करके दर्शन लाभ ले सकते हैं| मंदिर की परिक्रमा करते हुए कंचनजंघा पर्वत और गंगटोक शहर के दूर तक के नजारों का आनंद लिया जा सकता है।

ताशी व्यू पॉइंट

गणेश टोक से कुछ किलोमीटर चलने के बाद ताशी व्यू पॉइंट पहुंचा जा सकता है। ताशी व्यू पॉइंट गंगटोक का मुख्य दर्शनीय स्थल है| यह शहर से लगभग आठ-दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से कंचनजंघा का नजारा बहुत ही आकर्षक प्रतीत हो रहा था| इसे देखने पर ऐसा लगता है मानो यह पर्वत आकाश से सटा हुआ हो और हर पल अपना रंग बदल रहा हो| बर्फ से ढकी कंचनजंघा पर्वत श्रृंखला के साथ सूर्यास्त का न भुलाये जाने वाला शानदार नजारा देख खुशी और उत्साह का ठिकाना ही नहीं रहता|

गंगटोक की तरफ लौटते हुये सड़क किनारे बहते हुए बेहद ही सुन्दर बकथांग झरना मिला| वैसे तो बारिश के मौसम में सिक्किम में जगह-जगह झरने नजर आ जाते हैं, पर इस झरने की ऊंचाई और इसकी बनावट इसको खास बना देती है। हरियाली के बीच पहाड़ की काफी ऊंचाई से पानी की अधिक मात्रा में एक साथ गिरता ये झरना और चारों ओर उड़ती पानी की बूंदें मंत्रमुग्ध कर देती हैं।

रात को रोशनी से नहाया गंगटोक शहर और भी खूबसूरत लगता है| करीब पौना किलोमीटर लम्बा यह बाजार यहाँ का बहुत ही सुन्दर और सरकार के द्वारा पूर्णत व्यवस्थित बाजार है। यहाँ पर वाहन लाने पर प्रतिबन्ध है, सो इस मार्ग पर पैदल ही घूमना पड़ता है। बाजार में बीच में छोटे-बड़े गमलों में फूल-पौधे और सुन्दर लैम्प पोस्ट की कतारें लगाकर सजावट की गई है। बैठने के लिए जगह पत्थर के बैंच और फव्वारे लगाए गए हैं| जहाँ पर यहां के लोकल लोग, सैलानी और राहगीर कुछ देर बैठकर आराम कर सकते हैं और खिली धूप का आनंद ले सकते हैं। इस मार्ग पर शहर के अच्छे होटल, तरह-तरह के समानों की दुकानों के साथ-साथ खाने-पीने के अच्छे रेस्तरां भी हैं| सुबह का गंगतोक शाम से भी ज़्यादा प्यारा लगता है| पहाड़ों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ मौसम बदलते देर नहीं लगती|

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नाथुला दर्रा

गंगतोक से निकलते ही हरे भरे देवदार के जंगल स्वागत करते हैं| हर बार की तरह धूप में वही निखार था। कम दूरी का मतलब ये भी था की रास्ते भर ज़बरदस्त चढ़ाई। 30 कि.मी. की कठिन चढ़ाई पार करने के बाद, रास्ते के दोनों ओर बर्फ के ढेर दिखने लगते हैं| मैदानों में रहने वाले लोगों के लिए बर्फ की चादर में लिपटे इन पर्वतों को इतने करीब से देख पाना अपने आप में एक सुखद अनुभूति होता है।

छंगू झील

छंगू झील पर आने के लिये देशी या विदेशी पर्यटकों को गंगटोक से ही परमिट बनवा कर लाना पड़ता है। ये परमिट सिक्किम पर्यटक कार्यालय से या फिर ट्रैवल एजेंट की सहायता से बनवा सकते हैं| लगभग एक घंटे के सफ़र के बाद झील पहुँचा जा सकता है| झील के चारों तरफ के ऊँचे पहाड़ इसकी खूबसूरती में चार-चाँद लगाते हैं| सर्दियों में पहाड़ों में बर्फबारी और अत्यधिक ठण्ड के कारण ये झील जम जाती है| स्थानीय निवासियों के अनुसार मौसम के हिसाब से झील अपना रंग बदल लेती है। छंगू झील के पास आगे की बर्फ का मुकाबला करने के लिए घुटनों तक लंबे जूतों और दस्तानों से लैस होना पड़ता है।

बाबा मंदिर

बाबा हरभजन सिंह मंदिर जो कि नाथू–ला और जेलेप–ला के बीच स्थित है। ये मंदिर, 23वीं पंजाब रेजीमेंट के एक जवान की याद में बनाया गया है, जो डयूटी के दौरान इन्हीं वादियों में कहीं गुम हो गया था। बाबा मंदिर की भी अपनी एक रोचक कहानी है| बाबा मंदिर के पास सैलानियों की ज़बरदस्त भीड़ मौजूद थी। मंदिर के चारों ओर श्वेत रंग में डूबी बर्फ ही बर्फ थी। उफ्फ क्या रंग था प्रकृति का, ज़मीं पर बर्फ की दूधिया चादर और ऊपर आकाश की अद्भुत नीलिमा|

खाना और संस्कृति

सिक्किम का खाना और संस्कृति दो चीज़ें हैं जिसने इस छोटी, सुन्दर जगह को एक महत्वपूर्ण जगह दी है। यहां के लोग ज़्यादातर चावल खाते हैं। यहां के कुछ प्रमुख परंपरागत व्यंजन हैं: मोमोज़, चाऊमीन, वानटोन, फ़कथू, ग्या थुक या थुकपा- नूडल पर आधारित सूप, फग्शापा और चुर्पी के साथ निंग्रो।

ध्यान रहे यह खास बातें: 

  • सिक्किम की एक और बात बहुत प्रभावित करती है, वह यह है कि यहां पर अधिकतर लड़कियां काम करती हुई नजर आती हैं। रास्तों में स्कूल-कॉलेज जाती हुई लड़कियां, वहां की मनमोहक पोशाकों के साथ-साथ अधिकतर लड़कियां वेस्टर्न ड्रेसेस में दिखाई पड़ीं। वहां कहीं लड़कियों के साथ कोई छेड़छाड़, छींटाकशी का माहौल नजर नहीं आता, जैसा कि अन्य राज्यों में अक्सर देखने को मिलता है। ऐसा सुखद और सौहार्द पूर्ण वातावरण, लड़कियों में इतना आत्मविश्वास, ऐसा महसूस होता था कि मातृ प्रधान समाज हो। और कहते हैं ना ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते तत्र रमंते देवता’ अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। फूलों से खिलखिलाते चेहरे, माथे पर कोई शिकन का नाम नहीं है सचमुच ऐसी खिलखिलाहट तो देवताओं के घर में ही हो सकती है ना। स्थानीय लोगों से इस बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि यदि यहां पर किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ होती है तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं कि छेड़छाड़ करने वाले का सिर ही कलम कर दिया जाए।

  • एक और चीज जो अपनी यात्रा के दौरान मुझे देखने को मिली, वह है सिक्किम में ट्रैफिक नियमों का पालन| गाड़ियों की लंबी लंबी कतारें तो थी, लेकिन संकरे रास्तों की वजह से, ना कि ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन की वजह से। सामने से आने वाली लेन खाली है पर मजाल है कोई व्यक्ति अपनी लेन तोड़कर सामने की लेन में चला जाए।

  • यहाँ पर इतने मंदिर हो आये, कई व्यू पॉइंट घूम लिए, मार्किट घूम लिए पर कहीं भी कोई भिखारी नहीं दिखा।
    एक विशेष बात यह कि यहाँ पर आप मार्किट में या सड़क पर सिगरेट नहीं पी सकते। जगह–जगह पर वार्निंग के साइन बोर्ड लगे हुए हैं|

  • जहां अन्य राज्यों में इतने प्रयासों के बाद पल्यूशन कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है वहीं अगर सिक्किम की बात करें तो यहां पल्यूशन का तो जैसे नाम ही नहीं|

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