रेल चली भई रेल चली | Nightbulb.in- Hindi Poem, Hindi Poetry

रेल चली भई रेल चली

रेल चली भई रेल चली

अपनी प्यारी रेल चली

इंजन सीटी जब देता है

लगे, खुशी की ठेल चली ||

रेल चली भई रेल चली

कोई नानी के घर जा रहा

किसी को चाचू बुला रहा

हो गई है, धक्कम पेल चली  ||

रेल चली भई रेल चली

खेतों के बीच पहाड़ों से

पेड़ों के बीच कतारों से

करवाती सबका मेल चली ||

रेल चली भई रेल चली

ये छुक-छुक करती चलती है

मन धुक-धुक, धुक-धुक करता है

मस्ती की रेलमपेल चली ||

रेल चली भई रेल चली

जब बीच में स्टेशन आता है

खुशियों की कड़ियां जुड़ती हैं

लगता है जैसे बगिया में

अमरप्रेम की बेल चली ||

रेल चली भई रेल चली

अपनी प्यारी रेल चली ||

Image Source : www.mumpacktravel.com

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