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काश के साथ आख़िर…

काश के साथ आख़िर क्यूँ ठहरती है ज़िंदगी
सफ़र में बिछड़े लोगों के लिए क्यूँ पलटती है ज़िंदगी
मालूम होकर भी कि तुझे उसका साथ नहीं मिलेगा
जो ख़ामोश होकर चला गया वो तेरा हमसफ़र नहीं बनेगा
तेरे चिल्लाने पर भी तेरी आवाज़ को जो अब नहीं सुनेगा
मन्नत माँग ले तू कितनी, ऊपर वाला भी उसे कुछ नहीं कहेगा
फिर भी सोच लेती है ज़िंदगी, काश वो मेरे लिए मुड़ेगा

यह काश ही तो है, जो ज़िंदगी को एक ठहराव देता है
ख़ुशियों की भरी नगरी से ग़मों के जंगलो में धकेल देता है
इसके भरोसे ही तो इंसान मीलों का सफ़र पूरा कर देता है
हर चमकती हुई चीज़ पर एक आस की किरण छोड़ देता है
लेकिन आख़िर में वही, हमें अंधेरे में फेंक देता है
यह कोई और नहीं, काश ही है जो आधा-अधूरा कर देता है

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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