आखिर कौन थे मुगलकाल में जमाली-कमाली

एक वक्त था, जब राजघराने के अलावा उन लोगों को भी तरजीह दी जाती थी, जो किसी न किसी हुनर में दुर्रस्त थे। अकबर के साथ बीरबल की कहानियां मशहूर होना भी ऐसा ही एक उदाहरण है। आज हम आपको दो ऐसे शख्सियत के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें जिंदगी भर जिस प्रकार से सम्मान दिया गया था, उसकी प्रकार से उनकी कब्र को भी दिल्ली की सल्तनत ने तरजीह दी थी। इनके नाम हैं जमाली और कमाली। कौन थे जमाली और कमाली, जानिए इस खास खबर से –

जमाली शब्द उर्दू के जमाल से निकला है, जिसका अर्थ होता है ब्यूटी यानी सुंदरता। मुगलकाल से भी पहले सिकंदर लोदी के काल में सूफी संत हुए थे, जिनका नाम था जमाली उर्फ शेख फजलुल्लाह। उन्हें शेख जमाली कम्बोह उर्फ जलाल खान नाम से भी जाना जाता था। शेख साहब सिंकदर लोदी सल्तनत से लेकर मुगल काल में बाबर के समय तक रहे थे। दोनों ही सल्तनत में उन्हें काफी मान-सम्मान दिया गया था। जमाली सूफी होने के साथ- साथ कवि भी थे।

कमाल के बारे में इतिहास में काफी कम लिखा गया है। लेकिन माना जाता है कि वह सूफी जमाल के अनुचर और हर काम में हाथ बंटाने वाले खास साथी थे। मुगलकाल में दोनों को इतना सम्मान दिया गया कि उनकी कब्र भी एक साथ ही बनाई गई थीं। यह कब्र दिल्ली के महरौली के आकिर्योलॉजिकल गांव परिसर में स्थित है। इसे जमाली-कमाली के मकबरा के नाम से जाना जाता है।

मकबरा नहीं, लगता है जेवर रखने का एक बॉक्स

जमाली की मौत के बाद उन्हें यहीं दफना दिया गया था। इस जगह का नाम इन दो महान हस्तियों जमाली और कमाली के नाम पर ही रखा गया है। 16वीं सदी में 1528 को इसे बनाना शुरू किया गया था। इसे बनाने में करीब नौ साल लगे यानी 1536 में यह बन कर तैयार किया गया। जमाली कमाली मस्जिद के साथ ही एक पार्क है, जिसे 15278-29 में बनवाया गया था। इसका एंट्री ग्रेट दक्षिण से है। जमाली-कमाली की मस्जिद के साथ बनी मस्जिद को लाल सेंड स्टोन और मार्बल से बनाया गया है। यह भी कहा जाता है कि इसका डिजाइन मुगलकालीन है।

मुख्य प्रार्थना हाल से ठीक पहले बड़ा सा परिसर है, जिसमें एक मुख्य बड़ा आर्च यानी महराब है, जिसके साथ-साथ पांच आर्च बनाए गए हैं। मुख्य आर्च पर ही गुंबद बनाई गई है। दीवारों-खंबों को काफी अच्छे ढंग से सजाया गया है। इसी परिसर में जमाली और कमाली का मकबरा भी है, जिसे 25 फिट चौकोर स्ट्रक्चर में बनाया गया है। यह मस्जिद के नॉर्थ साइड में स्थित है। मकबरे की दीवारें और छत भी अंदर से काफी अच्छे ढंग से सजाई गई है। यहां लाल और नीला पेंट किया गया है। यह ऐसा लगता है, जैसे जेवर का बॉक्स रखा हो। अंदर मार्बल की दो कब्र हैं, जिसमें से एक जमाली की है और दूसरी कमाली की।

कुतुब मीनार से जुड़ा है जमाली-कमाली का मकबरा

जमाली सुन्नी कारोबारी परिवार से थे। शेख शमाअद्दीन की शागिर्दी में जमाली सूफियाना की तरफ मुड़ गए। सिर्फ सूफी के तौर पर ही नहीं, बल्कि जमाली कवि के तौर पर भी प्रसिद्ध थे। उन्होंने एशिया और मिडिल ईस्ट देशों की भी लंबी यात्रा की थी। लोदी काल में जमाली राज दरबार के कवि बन गए, जिसके बाद उन्हें बाबर फिर बाबर के बेटे हुमायुं के दरबार में भी वही इज्जत वक्शी गई। कहा जाता है कि जमाली का मकबरा हुमायुं के दौर में पूरा करवाया गया था। कुतुब मीनार से ठीक बराबर में सीधे हाथ को जमाली कमाली का मकबरा है। हालांकि, लोग इसके बारे में सिर्फ इतना जानते हैं कि यह एक मुगलकालीन स्ट्रक्चर है। कुतुब मीनार की बाउंड्री सांझा करती जमाली-कमाली मस्जिद और मकबरे का प्रवेश द्वार कुतुब मीनार से महज 500 मीटर की दूरी पर है। यहां कोई एंट्री फीस भी नहीं है।

इलाके में कई कहानियां भी हैं मशहूर

यहां के बारे में कई किस्से कहानियां भी मशहूर हैं। कहा जाता है कि यहां आप अंधेरे में होने पर अकेला पन महसूस नहीं करेंगे। ऐसा लगेगा मानों, आपके साथ कोई खड़ा या बैठा है। जानवरों की गुर्राने और रोने की आवाज सुनाई देती है। कभी कबार यह भी लगता है मानों आपको कोई देख रहा है। किसी के सांस लेने और अहसास तक लोगों ने महसूस किया है।

 

Image Source : www.nikhilchandra.in

 

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