भगत सिंह की टोली में थी एक महिला क्रांतिकारी, पढ़िए पूरी कहानी

भारत की स्वतंत्रता की बात जब भी जुबां पर आती है, तब आम लोगों से लेकर राजनेताओं की जुबां पर कुछ ही नाम सुनने को मिलते हैं। इसकी वजह जायज है, क्यूंकि महात्मा गांधी, भगत सिंह, राजगुरू समेत नामी क्रांतिकारियों के कारनामों ने अंग्रेजी हुकुमत के पैरों से जमीन खींच रखी हुई थी। लेकिन कुछ क्रांतिकारी ऐसे भी थे, जिन्हें भले ही इतिहास के पन्नों में उतनी तवज्जो न मिली हो, लेकिन फिर भी वे हर एक भारतीय के लिए अमर रहेंगे।

आज हम आपको ऐसी ही एक महिला क्रांतिकारी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने क्रांतिकारी भगत सिंह को जेल से रिहा कराने के लिए अपने गहने तक बेच दिए थे। इनका नाम था दुर्गावती देवी।

  • दुर्गावती देवी वो महिला थीं, जिन्होंने भगत सिंह के क्रांतिकारी गतिविधियों में शुरूआत से ही मदद की थी। दुर्गावती देवी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के मेंबर भगवती चरण वोहरा की पत्नी थीं।

 

  • दुर्गावती देवी को सबसे ज्यादा उस कारनामे के लिए याद किया जाता है, जब उन्होंने सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह को बचाने में मदद की थी। 19 दिसंबर 1918 के दिन राजगुरू ने क्रांतिकारी दुर्गावती देवी से मदद मांगी, जिसको उन्होंने मना नहीं किया। भगत सिंह ने पुलिस ने बचने के लिए अपनी दाड़ी और बाल कटवा लिए थे। जिसके बाद सुखदेव और भगत सिंह दुर्गावती देवी के घर पहुंचे, जहां दुर्गावती भगत सिंह को पहचान नहीं पाईं। ऐसे में दोनों ने समझ लिया कि अगर दुर्गावती नहीं पहचान पाईं, तो पुलिस भी नहीं पता लगा पाएगी। सुखदेव भगत सिंह के नौकर बने और दुर्गावती अपने 11 साल के बेटे के साथ भगत सिंह की पत्नी बनकर निकल पड़े। भगत सिंह शहर से निकलने के लिए रेलवे स्टेशन गए, जहां उन्होंने तीन टिकट खरीदीं। एक टिकट सुखदेव की साधारण बोगी के लिए और दो वीआईपी टिकट खरीदीं। दुर्गावती भगत सिंह की पत्नी बनकर ट्रेन में चढ़ी और पुलिस को चख्मा देने में कामयाब हुईं। यह कांड बॉलीवुड की फिल्म ” द लैजेंड ऑफ भगत सिंह ” में भी दिखाया गया है।
  • दुर्गावती देवी ने 1929 में भगत सिंह द्वारा एसेंबली में बम गिराए जाने के दौरान भी मदद की थी। दुर्गावती देवी ने लॉर्ड हैली को भी मारने की कोशिश की थी, लेकिन वह बच निकला। हालांकि, हैली के कई समर्थक मारे गए। दुर्गावती देवी ने बम ब्लास्ट मामले में भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों को छुड़वाने की भरपूर कोशिश भी की थी। उन्होंने अपने कीमती सामान जैसे सोना, ज्वेलरी आदि बेचकर 3000 रुपये इकट्ठे किए थे।

 

  • इतना ही नहीं, दुर्गावती देवी ने अपने पति के साथ मिलकर एचएसआरए (HSRA) के मेंबर विमिल प्रसाद जैन की दिल्ली की कुतुब रोड पर बम बनाने की फैकट्री में मदद भी की थी। यहां फैकट्री का नाम हिमालयन टॉयलेट था, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य को इसकी भनक न लगे।

 

  • भारत के आजाद होने के बाद दुर्गावती देवी गाजियाबाद में साधारण महिला के तौर पर जीवन बिताने लगीं। उन्होंने कुछ समय के लिए लखनऊ में गरीब बच्चों के लिए स्कूल भी चलाया था। दुर्गावती देवी का स्वर्गवास 15 अक्टूबर 1999 के दिन 92 साल की उम्र में गाजियाबाद में ही हुआ।

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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