Jaha Jinoo Se Hoti Hai Fariyad | NightBulb.in-Hindi Blog

जहां जिन्नों से होती है फरियाद

दिल्ली का एक ऐसा किला, जहां भूत, प्रेत और जिन्नों का राज है। यहां एक वक्त था, जब राजा शासन करते थे, लेकिन आज यहां भूत-प्रेत और जिन्नों के आगे लोग सिर झुकाते हैं। यह जगह कहीं ओर नहीं दिल्ली के बीचों-बीच है। कौन-सा है यह किला। आइए आपको बताते हैं।

कहते हैं इस किले में भूत प्रेतों और खासतौर पर जिन्नों का वास है। हर गुरुवार को यहां पर जिन्नों से मन्नत मांगने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ आती है। ये लोग यहां पर मोमबत्तियां, धूप अगरबत्तियां जलाते हैं। दूध, फल, मिठाईयां और अनाज वगैरह भी चढ़ाते हैं और अपनी मन्नत पूरी होने की दुआ मानते हैं। अपनी मन्नतों और फरियाद के लिए जिन्नों को पत्र तक लिख कर छोड़ कर जाते हैं। दीवार पर सिक्के तक चिपकाते हैं। इसके पीछे भी सभी की अलग अलग मान्याताएं और विश्वास है। कोई मानता मानता है तो कोई रूठे जिन्न को मनाने की कोशिश करता है। यहां की रहस्यमय दुनिया हर किसी को एक बार अपनी ओर जरूर खिंचती है और बार-बार यहां आने को मजबूर तक करती है।

जाने इस किला का इतिहास:

यह दिल्ली गेट के पास बहादुरशाह जफर मार्ग स्थित फिरोजशाह कोटला का किला दिल्ली में एक एतिहासिक आकर्षण का केंद्र है। दिल्ली के इस किले को फिरोजाबाद के नाम से जाना जाता था। दिल्ली को तब फिरोजाबाद भी कहा जाता था। मुगल सम्राट फिरोजशाह तुगलक ने 1354 में राजधानी तुगलकाबाद से यहां स्थांनतरित कर बनाया था। किले का यहां बनवाने का एक मकसद यह भी था कि जहां अब रिंग रोड और इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम आदी हैं वहां पर यमुना जी बहती थी। यमुना जी के किनारे किला एक तरफ से महफूज था और पानी की कभी भी कमी यहां नहीं हो सकती थी। उस वक्त इस किले फिरोजशाह कोटला में खूबसूरत बाग, महल, मस्जिद और मदरसा वगैरह बनवाए गए थे। इस किले ने तुगलकों की तीन पीढ़ियां देखी हैं।

किले का प्रवेश द्वार काफी ऊंचा है और इसके चारों तरफ की दीवार करीब 15 मीटर ऊंची हैं। किले के अंदर जाने पर बाग के आलावा आशोक स्तंभ और और एक बाउली में है। जरूरत पड़ने पर यहां से किले और शहर के लिए पानी की कमी को पूरा किया जाता था। मौर्या सम्राट के काल के कई अशोक स्तंभों में से एक यहां फिरोजशाह कोटला के किले में भी तीसरी सदी में स्थापित किया गया था, जो कि आज भी यहां पर मुस्तैदी से खड़ा है। इसे आज भी अशोक की लाट नाम से जाना पहचाना जाता है। कहते हैं जितनी ऊपर यह स्तंभ दिखाई देता है उससे कहीं अधिक नीचे यह जमीन में भी है। इस स्तंभ पर ब्रह्मी, पाली और संस्कृत में गोद कर लिखा गया है। 1837 में जेम्स प्रिसिप ने लाट पर लिखी लिपी का अनुवाद किया था। इस पर सम्राट अशोक की नीति और संदेश लिखे हैं।

फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली पर 1351 से 1388 तक राज किया था। फिरोजाबाद (अब की दिल्ली) को दिल्ली सल्तनत घोषित किया गया था। अशोक की लाट की लंबाई 13.1 मीटर, गोलाई में यह स्तंभ ऊपर की तरफ 65 मीटर और नीचे 97 मीटर डायामीटर चौड़ा है। पॉलिश्ड सैंडस्टोन का यह स्तंभ तीसरी सदी बीसी का है। इस 14वीं सदी एडी में फिरोजशाह के आदेश पर अम्बाला से दिल्ली लाया गया था। सुल्तान के कहने पर किले में मस्जिद के पास इस अशोक की लाट को फिरोजशाह कोटला में तीन मंजिला इमारत के ऊपर स्थापित किया था। इस फिरोजशाह कोटला किले और इस स्तंभ ने दिल्ली में कई सदियों तक का इतिहास देखा है। दिल्ली के उजड़ते बसते हर रूप रंग का यह गवाह रहा है।

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पुरानी दिल्ली के पुराने बचे खुचे लोग याद कर बताते है कि यहां आजादी से कुछ पहले और काफी बाद तक इस फिरोजशाह कोटला के किले में कुछ एक कार्यक्रम किए जाते थे। हमें भी याद है करीब 15 से 20 साल पहले तक दिल्ली गेट से हम यहां पर रोजाना सुबह की सैर करने के लिए आया करते थे। अशोक की लाट तक तीन मंजिला चढ़ कर जाना रोज का काम था यहीं पर खेलते दौड़ते भागते रहते थे। तब यहां पर किले में जाने के लिए कोई टिकट भी नहीं हुआ करता था। जब मन करता आते थे जब मन करता जाते थे। घंटों यहां पर बिता दिया करते थे। स्कूल की छुट्टियों में तो यहां तक सुबह दोपहर को भी आना जाना लगा रहता था। यहां की बाउली में अब जाना मना है।

इसके चारों तरफ लोहे की ग्रिल लगवा कर इसे लोगों के लिए बंद कर दिया गया है। लेकिन उस समय हम घंटों बाउली में नीचे तक चले जाया करते थे। सुनते आते थे कि यहां पर खजाना छिपा है। अशाके की लाट, बाउली वगैरह में कई बार हमें सांप वगैरह भी दिखे थे। उस समय यहां पर पढ़ने आने वाले काफी लोग घंटों सुबह शाम शांति में बैठे अपनी पढाई किया करते थे। हम भी उनकी देखा देखी किताबें ले आते थे लेकिन पढ़ते कम खेलते ज्यादा थे। यहां फिरोजशाह कोटला के मेन गेट के पास जिन्नों की इबादत और पूजा के लिए एक ही जगह थी या फिर अंदर मस्जिद के पास अशोक की लाट के नीचे जगह थी। लेकिन अब तो हालत यहां के काफी बदल गए हैं। यहां तो अब हर जगह पूजा पाठ और इबादत की जाती है। जिन्नों के यहां पर निवास और अन्य किस्से कहानियों के कारण अकेले जाते डर भी लगता था। अंधेरा घिरने पर तो सवाल ही पैदा नहीं होता था कि यहां पर हम कभी गए हो। एक अजीब सा रहस्मय सन्नाता और डर यहां पर चप्पे-चप्पे पर विराजमान महसूस होता था। सिर्फ किस्से कहानियों के अलावा यहां पर कभी न देखा न सुना फिर भी डर दिल में घर करे रहता था।

कैसे पहुंचे

यहां पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन फिलहाल प्रगति मैदान है लेकिन जल्द ही आईटीओ और दिल्ली गेट का मेट्रो स्टेशन खुलने से यह मेट्रो स्टेशन के और करीब हो जाएगा। पुरानी दिल्ली आौर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन भी नजदीक है। आइएसबीटी कश्मीरी गेट नजदीक पड़ता है। यहां तक जाने के लिए डीटीसी की बसों की भी कोई कमी नहीं है। अपने वाहन, ऑटो रिक्शा, साइकिल रिक्शा किसी भी तरह से यहां पर आसानी से पहुंचा जाया जा सकता है। यानी यह एक तरह से प्राइम लोकेशन पर है। यहां जाने के लिए आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की तरफ से पांच रुपए एंट्री फीस भी है।

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