मुगल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना फतेहपुरी मस्जिद

मुगल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना : लाल पत्थरों से बनी यह मस्जिद भी मुगल वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है। मस्जिद के दोनों तरफ लाल पत्थरों से बने स्तंभों की कतारें है। इस मस्जिद में पानी का एक कुंड भी है जो कि सफेद संगमरमर से बनाया गया है। इतिहास में कई धार्मिक वाद-विवाद का गवाह रही है यह फतेहपुरी मस्जिद।

दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद भी जामा मस्जिद की तरह सबसे पुरानी मस्जिद में एक है। इस मस्जिद का भी वही रुतबा और शान है। मुगल काल के दौरान शाहजहानाबाद की यह काफी अहम मस्जिद थी। फतेहपुरी मस्जिद पुरानी दिल्ली में चांदनी चौक के पश्चिमी छोर पर स्थित है। फतेहपुरी मस्जिद चांदनी चौक का लैंड मार्क भी है। जामा मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने 1656 में करवाया था। फतेहपुरी मस्जिद का निर्माण शाहजहां की एक बेगम फतेहपुरी बेगम ने 1650 में करवाया था। उन्हीं के नाम पर इस मस्जिद का नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। बेगम फतेहपुर से थीं। उन्हीं के नाम से आगरा में ताजमहल परिसर में बनी मस्जिद का नाम भी है।

अंग्रेजों की फौज ठहरी थी : 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने अन्य कई जगहों की तरह इस मस्जिद को भी अपने कब्जे में ले लिया था। यहां अंग्रेजों की फौज को ठहरा दिया गया था। बाद में अंग्रेजों ने इसे नीलाम करने का फैसला किया। नीलामी में इस फतेहपुरी मस्जिद को चांदनी चौक के राय लाला चुन्नामल ने 19000 रुपए में खरीद लिया। जिनके वंशज आज भी चांदनी चौक स्थित चुन्नामल की हवेली में रहते हैं।


मुसलमानों को वापस किया : कई साल तक लाला चुन्नामल ने इस मस्जिद को संभाले रखा। बाद में 1877 में दिल्ली दरबार के दौरान तत्कालीन सरकार ने जब मुसलमानों को दिल्ली में दोबारा रहने का अधिकार दिया था तो मस्जिद को महरौली के चार गांवों के बदले वापस अधिकृत करके मुसलमानों को सौंप दिया गया। कहते है ठीक इसी तरह की एक और मस्जिद अकबराबादी बेगम ने भी बनवाई थी। जिसे 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों द्वारा बर्बाद कर दिया गया था।

3.5 फुट ऊंचे प्लैटफॉर्म पर मुख्य प्रार्थना कक्ष: करीब साढ़े तीन फिट ऊंचे प्लैटफॉर्म पर मस्जिद का मुख्य प्रार्थना कक्ष है। ऊपर ही मस्जिद का मुख्य एक मात्र गुंबद भी है, जिसके दोनों तरफ 80 फुट की मीनारे हैं। फतेहपुरी मस्जिद के तीन गेट हैं। एक गेट लाल किले के ठीक सामने चांदनी चौक की तरफ है। उत्तरी गेट खारी बावली की तरफ और दक्षिणी गेट कटरा बरयान की तरफ खुलता है। मस्जिद का मुख्य परिसर लाल पत्थरों से बनाया गया है। परिसर में दो 12 फुट के बरामदे हैं। यहां दोनों तरफ मुख्य आर्क बनाए गए हैं और छत पर कंगूरा डिजाइन है। बीच में काफी बड़ा हौज (पानी का टैंक) है। यह हौज वुजू के काम आता है। मुगल काल के दौरान मस्जिद के पानी के हौज जहां वुजू किया जाता है का पानी सीधा यमुना जी से भारा जाता था, लेकिन अब पानी की टोटियों से पानी भरा जाता है। परिसर में ही करीब 20 महान इस्लामिक स्कॉलर की कब्र भी हैं, जिनमें हजरत नानू शाह, मुफ्ती महमूद मजहर उल्लाह शाह और मौलाना मोहम्मद अहमे आदि खास हैं।

काफी नुकसान पहुंचा है:  मुगलकाल के दौरान इस खूबसूरत रही मस्जिद की रौनक ही अलग थी। इसमे कई फव्वारे लगे थे। लेकिन पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजी फौजों ने मस्जिद को नुकसान पहुंचाया। यहां के काफी लाल पत्थर निकाल दिए गए। दीवारों पर अपने नाम उकेर उकेर कर लिख सुंदर दीवारों को बदरंग कर दिया गया। मस्जिद मे स्वतंत्रा संग्राम कुचलने की खुशी में यहां अंग्रेज फौजियों द्वारा जश्न मनाए गए शराब बहाई गई।

फतेहपुरी मस्जिद को गरीबों की जामा मस्जिद के नाम से जाना जाता है। जामा मस्जिद की तरह यहां पर पर्यटकों का तांता लगा रहता है। यहां आने का वैसे तो सुबह से शाम तक समय ही समय है लेकिन शाम के वक्त यहां की छटा निराली होती है। चांदनी चौक आने वाले हर धर्म के देसी विदेशी टूरिस्ट एक बार फतेहपुरी मस्जिद जरूर आते हैं। ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुआ पर तो यहां का नजारा देखने लायक होता है।

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