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बावड़ियों में बावड़ी ‘अग्रसेन की बावड़ी’

दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस की रौनक कई ऐसी चीजों को छुपा देती है, जो भारत के इतिहास की शान हैं। इतिहास के पन्नों में जिनके बारे में विस्तार से लिखा हुआ है। जो अपने समय की जानी मानी इमारतें हुआ करती थीं। जी हां, आज हम आपको एक ऐसे ही ऐतिहासिक इमारत की जानकारी दे रहे हैं, जो दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस से चंद कदमों की दूरी पर है। यह है अग्रसेन की बावड़ी
अग्रसेन की बावड़ी कुछ समय पहले तक कंक्रीट के जंगल, लोगों के शोर-शराबे और आपाधापी के बीच सदियों से शांत थी। इस ठिकाने का कोई राहगीर नहीं था। पुरातत्व विभाग भी यहां की मरम्मत करने में अपना समय व्यर्थ करना पसंद नहीं करता था। बावड़ी के अंदर सांप, चमकादड़ और कबूतरों का ठिकाना बन चुका था। वहीं अाज अग्रसेन की बावड़ी में रौनक रहने लगी है। कोई इसे अग्रसेन की बावड़ी तो कोई उग्रसेन की बावड़ी के
नाम से पुकारता या फिर कहें जानता है।

क्या है अग्रसेन की बावड़ी का इतिहास 

अग्रसेन की बावड़ी को भारत सरकार ने 1958 में आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के एक संरक्षित स्थल के तौर पर घोषित किया था। इस बावड़ी में सीढ़ीनुमा कुएं में करीब 105 सीढ़ीयां हैं। इतिहास के अनुसार 14वीं शताब्दी में महाराजा अग्रसेन ने इसे बनवाया था। बावड़ी के निर्माण में लाल बलुए पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। आड़े तिरछे मतलब बगैर तराशे हुए और तराशे गए पत्थरों से निर्मित यह दिल्ली की बेहतरीन बावड़ियों में से एक है। यह बावड़ी करीब 60 मीटर लंबी और 15 मीटर ऊंची है। इसके बारे में यह भी प्रचलित है कि विश्वास किया जाता है कि यह बावड़ी महाभारत काल की है। उसी काल में इसका निर्माण कराया गया था। बाद में अग्रवाल समाज ने इस बावड़ी का जीर्णोद्धार कराया। इस बावड़ी की स्थिति इतनी सदियां बीतने के बाद भी अधिक खराब नहीं हुई है। यह अभी भी काफी अच्छी स्थिति में हैं। सिर्फ पानी लगभग सूख चुका है।
बावड़ी की स्थापत्य शैली 13वीं से 16 वीं ईस्वी तुगलकाल और लोदी काल से भी काफी मेल खाती है। दिल्ली की इस अग्रसेन की बावड़ी को एक अद्वितीय और रोचक स्मारक कहना अतिश्यक्ति नहीं होगा।
बावड़ी को कहते हैं भूतहा जगह
इस बावड़ी के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह एक भूतहा जगहा है। इसी कारण यह बावड़ी देश की दस सबसे भूतहा जगहों में शुमार है। असल में कई साल पहले तक यहां पर कई बार, कई लोग बावड़ी के भरे पानी में कूद कर अपनी जान दे चुके हैं। सूनी रहने वाली यह खंडहर भुतहा जगह डरावनी दिखाई देती है बाकि काम कर जाते हैं यहां के किस्से कहानियां। लेकिन अब तक कोई ऐसा प्रमाण मिला नहीं है न ही कोई घटना देखने सुनने को मिली है। हां, आजकल स्कूल कॉलेज के बच्चे, घूमने आने वाले सैलानी और प्रेमी जोडों की संख्या अधिक है। कई मनचले भी अन्य जगहों की तरह यहां खिंचे चले आते हैं। अंधेरे होने के बाद यहां जाना सुरक्षित नहीं है।
फिल्म पीके में था आमिर का यह घर
फिल्म में आपने कई ऐसे दृश्य देखे होंगे, जिनमें दिन भर अपना रिमोटवा खोजने के लिए रात में पीके यानी आमिर खान यहां बैठकर सोचता था कि उसका रिमोटवा आखिर मिलेगा कैसे। जी हां, अग्रसेन की बावड़ी में ही आमिर खान के उन दृश्यों को फिल्माया गया है। यहां की चहल पहल के अचानक बढ़ने की वजह आमिर खान की फिल्म ‘पीके’ भी है। यह नहीं कि भीड़ अब बढ़ी है। दरअसल, पॉपलुर होने के बावजूद इस जगह की जानकारी आज भी काफी कम लोगों को है। दिल्ली घूमने वाले कनॉट प्लेस तो जाते हैं, लेकिन यहां तक पहुंच नहीं पाते।
कैसे पहुंचे अग्रसेन की बावड़ी
यहां आपको पहुंचने के लिए कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल पर जुड़ने वाली कस्तूरबा गांधी मार्ग पर जाना होगा, जहां से आप हेली रोड पर जाकर अग्रसेन की बावड़ी तक पहुंच सकते हैं। कहा जाता है कि कुछ साल पहले तक यहां खूब लोग सैर करने, तो कोई यूं ही घूमने और बावड़ी में नहाने तो कई नहाते और बावड़ी की छत से इसके भरे हुए पानी में छलाग लगाते और स्वीमिंग करते लोगों को देखने आया करते थे। उस समय यहां नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली के लोग कभी तैराकी सीखने के लिए भी आया करते थे। इतना ही नहीं, हम पुरानी दिल्ली में रहते थे, हम भी उन दिनों यहां घूमने आया करते थे। उन दिनों कई बार तो पानी हमने यहां पर तीसरी मंजिल तक भी देखा है।
Image Source : www.pixels.com

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