तो यहां आज भी Cassettes की खरीददारी भरपूर है

टेक्नोलॉजी में समय की रफ्तार बुलेट ट्रेन से कहीं ज्यादा है। कुछ साल पहले कैसिट चलती थीं, जिसके बाद सीडी का जमाना आया। सीडी का जमाना आया ही था कि सीडी का चलना भी पुराना हो चला और पैन ड्राइव मार्केट में उतर गए। ऐसे- ऐसे इस मार्केट में इतनी तेजी आई कि आज के दौर में किसी भी तरह के डिवाइज की जरूरत आम लोगों को नहीं होती। अब मात्र मोबाइल में एक एप्लीकेशन से आप दुनिया भर के गाने सुन सकते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस देश को आधुनिक क्रांति का जनक कहा जाता है, उसमें आज भी कैसिट के जरिए गाने सुनने की चाहत रखने वाले लोगों की संख्या आज भी कम नहीं है। हम बात कर रहे हैं लंदन की। जी हां, इंग्लैंड के कुछ ऐसे ही आंकड़े हाल ही में सामने आए हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, साल 2018 में कैसिट की बिक्री इतनी हुई है, जो पिछले 14 साल में सबसे ज्यादा है। बिक्री इतनी थी कि साल 2017 के रिकॉर्ड भी टूट चुके हैं। यहां आज भी ऐसे शौकीन लोग हैं, जो अपने पुराने पैन से कैसिट की टेप को घुमाकर दोबारा अपना गाना सुनना पसंद करते हैं। ब्रिटिश फोनोग्राफिक इंडस्ट्री के मुताबिक, साल 2018 में 50 हजार एलबम कैसिट के जरिए बिकी हैं, जोकि साल 2017 की तुलना में लगभग 125 फीसदी ज्यादा है।

क्या आपके यहां है आज भी कैसिट चलाने वाले रेडियो ? 

आज के युवा भले ही इस चाहत को नहीं जानते होंगे, लेकिन 90s तक पैदा हुए बच्चों को अच्छे से याद होगा। कैसिट और टेप रखने के लिए अलग से एक अलमारी हुआ करती थी, जिसमें पुराने गाने की कैसिट और कुमार सानू, सोनू निगम, अलका यागनिक, लता मंगेश्कर जैसे बड़े- बड़े गायकों के अनुसार कैसिट लगाई जाती थीं। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के लिए भी अलग से कलेक्शन हुआ करती थी। कैसिटी की टेप रेडियो में चब जाने से एक पैन रखा हुआ होता था, जिसे घुमाकर कैसिट की टेप ठीक की जाती थी। हां एक और खास बात, पसंदीदा गाने की कैसिट बनवाने के लिए 2 रुपये हर गाने के रेडियो वाला लेता था।

 

Image : www.everpresent.com

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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