बोधगया का वो ज्ञान, जो हर कोई आपको नहीं देगा

बिहार, पटना के दक्षिणपूर्व में करीब 100 किलोमीटर दूर गया जिले से 12 किलोमीटर दूर एक छोटा शहर है-   बोधगया। करीब 500 ईसा पूर्व गौतम बुद्ध फाल्गु नदी के तट पर पहुंचे। फाल्गु नदी की सहायक नदी निरंजना नदी के तट पर पीपल के पेड़ के नीचे तपस्या की। तीन दिन और रात के तपस्या के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि इसी नदी में बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला स्नान किया था और भगवान बुद्ध कहलाए थे।

बोध गया का पुराना नाम था ‘उरूबिल्व’ 

बोध गया का प्राचीन नाम उरूबिल्व था। समूचा बोध गया बुद्ध को समर्पित-सा जान पड़ता है। बल्कि इसे ‘विश्व बंधुत्व का शहर’ कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां महा बोधि मंदिर मुख्य मंदिर कहलाता है। बौद्धों की दृष्टि में यह सबसे ज्यादा पवित्र है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ज्ञान प्राप्ति के स्थान पर सम्राट अशोक ने चिकने बलुआ पत्थर से निर्मित वज्रासन की स्थापना की थी। बनावट से भी यह गुप्त कालीन ढ़ाचा मालूम पड़ता है। शुंगकाल में वज्रासन के चारों ओर बलुआ पत्थर की वेदिका बनाई गयी। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान मंदिर का निर्माण ईसा की छठी सदी में हुआ। परवर्ती काल खंड़ों में इस मंदिर का जीर्णोद्वार कई बार किया गया, जिसमें बर्मियों का विशेष योगदान रहा।

सातवीं सदी में ह्वेनसांग ने बोधि वृक्ष को मंदिर और सैकडों स्तूतों और चैत्यों के साथ देखा था। चीन, जापान, थाईलैंड, तिब्बत-सबने अपनी आस्था को मंदिर का रूप दे दिया है। एक साथ अलग-अलग देशों की स्थापत्य कला और उनकी संस्कृति का भव्य प्रदर्शन शायद ही कहीं देखने को मिले। मंदिरों की नक्काशी स्वयं अपनी संस्कृति का परिचय कराती है।

मंदिर आकार में वर्गाकार है। इसके चारों कोनों पर इसी की तरह के चार छोटे मंदिर खडे़ हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार पूरबमुखी है। मंदिर के द्वार में शेर, हिरण आदि जीवों की चित्र उकेरे गए हैं, जो मंदिर को भव्यता और कलात्मकता प्रदान करते हैं। मुख्य द्वार के पास 500 किलोग्राम का घंटा टंगा है। मंदिर के अंदर सोने की पालिश वाली बुद्ध की एक मूर्ति ऊंचे आसन पर विराजमान है। दो मंजिला इस मंदिर में ऊपर वाली मंजिल में बुद्ध की माता माया देवी की प्रतिमा स्थापित है।

भिुक्षु के सपने में आए थे बुद्ध, फिर बनी थी मंदिर की सबसे खास मूर्ति

एक मान्यता है कि महाबोधि मंदिर में स्‍थापित बुद्ध की मूर्ति का संबंध स्‍वयं बुद्ध से है। कहा जाता है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा था तो इसमें बुद्ध की एक मूर्ति स्‍थापित करने का भी निर्णय लिया गया था। लेकिन लंबे समय तक किसी ऐसे शिल्‍पकार को खोजा नहीं जा सका जो बुद्ध की आकर्षक मूर्ति बना सके। सहसा एक दिन एक व्‍यक्‍ित आया और उसने मूर्ति बनाने की इच्‍छा जाहिर की। इसके लिए उसने पत्‍थर का एक स्‍तम्‍भ और एक लैम्‍प मांगा। उसने गांववालों से छ: महीने का समय मांगा कि छ: महीने से पहले कोई मंदिर का दरवाजा न खोले। लेकिन व्‍यग्र गांववासियों ने तय समय से चार दिन पहले ही मंदिर के दरवाजे को खोल दिया। मंदिर के अंदर एक बहुत ही सुंदर मूर्ति थी जिसका हर अंग आकर्षक था सिवाय छाती के। मूर्ति का छाती वाला भाग अभी पूर्ण रूप से तराशा नहीं गया था। कुछ समय बाद एक बौद्ध भिक्षु मंदिर के अंदर रहने लगा। एक बार बुद्ध उसके सपने में आए और बोले कि उन्‍होंने ही मूर्ति का निर्माण किया था। बुद्ध की यह मूर्ति बौद्ध जगत में सर्वाधिक प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त मूर्ति है। नालन्‍दा और विक्रमशिला के मंदिरों में भी इसी मूर्ति की प्रतिकृति को स्‍थापित किया गया है।

पक्षियों की चहचहाट के बीच बुद्धम्-शरणम्-गच्‍छामि की हल्‍की ध्‍वनि अनोखी शांति प्रदान करती है।

सप्त स्थान : तथागत के ध्यानावस्थिति तथा ‘सम् सम्बोधि’ प्राप्त करने के अवसर पर सात सप्ताह तक बिताए जाने वाले स्थान को कहते हैं।

1. बोधि वृक्ष – मुख्य मंदिर के पश्चिम में पीपल का वृक्ष है। इसी स्थान पर बुद्ध ने पूरबमुख बैठकर तपस्या की और ज्ञान प्राप्त किया। अशोक द्वारा निर्मित वज्रासन की वेदी इसी वृक्ष के समीप है। कहा जाता है कि इसी वृक्ष की शाखा को अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा द्वारा श्रीलंका भेजा था।

2. अनिमेड्ढलोचन स्तूप – यह 55 फुट ऊंचा एक स्तूप है ज्ञान प्राप्ति के बाद इसी स्थान से बुद्ध सात दिनों तक बोधि वृक्ष को श्रद्धापूर्वक देखते रहते थे।

3. चांक्रामना – यहां बुद्ध के पदचिह्न हैं। इस स्थान पर घूम घूमकर उन्होंने सोचा कि प्राप्त किए ज्ञान का प्रसार करना चहिए। कहा जाता है कि जहां जहां उनके चरण पड़े, वहां वहां कमल उग आए थे। बुद्ध के इन पदचिन्‍हों को धर्मचक्र प्रर्वतन का प्रतीक माना जाता है।

4. रत्नागार – तथागत ने यहां एक सप्ताह ध्यानावस्था में बिताया। यह उनका ध्यान कक्ष था। ऐसी मान्यता है कि यहीं उनके शरीर से पांच रंग बाहर निकले।

5. राजायतन वृक्ष – इस मंदिर परिसर के दक्षिण-पूर्व में राजयातना वृ‍क्ष है। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद अपना सांतवा सप्‍ताह इसी वृक्ष के नीचे व्‍यतीत किया था। यहीं पर बर्मा के दो व्‍या‍पारियों ने बुद्ध से आश्रय की प्रार्थना की। इन प्रार्थना के रूप में बुद्धमं शरणम गच्‍छामि (मैं अपने को भगवान बुद्ध को सौंपता हूं) का उच्‍चारण किया। इसी के बाद से यह प्रार्थना प्रसिद्ध हो गई।

6. अजापाल निग्रोध वृक्ष – इसके भी यथार्थ स्थान का पता नहीं लग सका है।

7. बोधि सरोवर – मंदिर के दक्षिण में एक तालाब है, जिसमें बुद्ध ने तपस्या करने से पूर्व स्नान किया था।

दाई बुत्सु : यह एक जापानी शब्द है, जिसका अर्थ होता है विशाल बुद्ध मूर्ति। इस प्रतिमा का निर्माण जापान के नागोया स्थित दाईजोक्या नामक संस्था ने कराया है। इस मूर्ति का नक्शा दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मूर्तिकार गणपति सतपथी ने तैयार किया। मूर्ति की ऊंचाई 64 फीट है। चुनार के गुलाबी पत्थरों को जोड़कर बनाई गई प्रतिमा खुले गगन में स्थित है। मूर्ति के ललाट पर जो स्वर्ण बिंदु है वह कांस्य निर्मित है। बुद्ध की मूर्ति इतनी प्राणवान लगती है, मानो वह अपने दर्शनार्थियों से कह रहे हों कि -‘सुनी हुई बाताें पर विश्वास न करो, परंपराओं में विश्वास न करो, क्योंकि वे पीढ़ी दर पीढ़ी चली आई हैं। किसी बात पर इसलिए विश्वास न करो कि वह जनश्रुति है और बहुत लोग उसे कह रहे है। किसी बात में केवल इसलिए विश्वास न कर लो कि किसी प्राचीन लिखत ऋषि वक्तव्य प्रस्तुत किया गया है। ख्याली बातों में विश्वास न करो। किसी बात पर इसलिए विश्वास न करो कि उसे तुम्हारे शिक्षकों ने कहा है। किसी बात पर केवल तब विश्वास करो, जब तुम उसे जांच परख लो और उसका विश्लेषण कर लो। जब यह देख लो कि वह तर्कसंगत है, तुम्हें नेकी के रास्ते पर लगाती है और सबके लिए लाभदायक है, तब तुम उसके अनुसार ही आचरण करो (कालम सूत्र: अंगुत्तर निकाय)।’

तिब्बत मठ : तिब्बतियों का यह मठ दरअसल ‘गदेन फेल ज्ञेलिंग’ तिब्बती महायान बुद्ध मंदिर है। यह अपने विशाल धर्मचक्र के लिए मशहूर है। कानून का यह चक्का श्रद्धालुओं में लोकप्रिय है। ऐसा माना जाता है कि इस चक्र को तीन बार घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं।

डुंगेश्वरी : बोध गया से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थल ‘प्राक्बोधि’ कहलाता है। ज्ञान की खोज में भटकने के दौर में तथागत ने डुंगेश्चरी गुफा में भी ध्यान लगाया था। बौद्धों के लिए यह भी महत्वपूर्ण स्थल है।

यह भी हैं बोधगया के दर्शनीय केंद्र

बोधगया पर्यटन के अन्तर्गत बुद्ध की 80 फीट ऊँची प्रतिमा, कमल का तालाब, बुद्ध कुण्ड, चीनी मन्दिर और मठ, बर्मीस़ मन्दिर, भूटान का बौद्ध मठ, राजायत्न, ब्रह्मयोनि, अन्तराष्ट्रीय बौद्ध हाउस, जापानी मन्दिर, थाई मन्दिर और मठ, तिब्बती मठ और एक पुरातत्वीय संग्रहालय जैसे कई अन्य आकर्षण भी आते हैं। ये सभी बोधगया के विकास की एक गाथा कहते हैं। गृधाकुटा राजगीर के रास्ते पर पड़ता है। यह स्थान एक शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। यहाँ आने पर राजगीर की पहाड़ियाँ अवश्य देखें जहाँ औषधीय गुण वाले गर्म पानी के सोते पाये जाते हैं और यहाँ पर स्त्री-पुरुष के लिये अलग-अलग स्नान की सुविधा है।

Photo Credit : www.photowe.com

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