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एवरेस्ट जैसे पहाड़ पर चढ़ना है तो संदकफू जाएं

आज एडवेंचर स्पोर्ट्स की तस्वीर बदल रही है। साहसिक खेल और टूरिज्म अगर मिल जाएं तो सोने में सुहागा सा लगता है। देश में जहां टूरिज्म और साहसिक खेल दोनों ही बढ़ रहे हैं, वहां न तो पर्यटन के लिए अच्छी जगहों की कमी है, न ही साहसिक खेलों की। देश में पर्वतारोहण, हैंग ग्लाइडिंग, रिवर राफ्टिंग, स्केटिंग, स्कीइंग आदि खेल लोकप्रिय हो रहे हैं। अब इसके लिए यूथ में इतना क्रेज है कि मानों कोई इनसे दूर नहीं रहना चाहता।

आइए जानते हैं संदकफू में क्या है खास, जो आपको वहां जाने से रोक नहीं पाएगा। हमने खुद संदकफू की तारीफ इतनी सुनी कि हमने भी एक बार वहां जाने का मन बनाया और निकल पड़े संदकफू की ओर।

संदकफू पर हैं एवरेस्ट जैसी पहाड़ियां और तंग रास्ते

हर कोई एवरेस्ट पर नहीं चढ़ सकता, लेकिन अगर आप पर्वतारोहण के शौकीन हैं तो बंगाल में दार्जीलिंग परिक्षेत्र में कई सुंदर और कठिन चढ़ाई वाली पहाड़ियां हैं जहां आप जा सकते हैं। इनमें एक जगह है मानेभंजन। यहां से आप संदकफू जा सकते हैं। यहां पहुंचने के लिए आपको न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंचना होगा।

कैसे पहुंचे संदकफू

जैसे आपको बताया कि संदकफू जाने के लिए आपको न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंचना होगा। न्यू जलपाईगुड़ी ट्रेन से देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण शहरों से जुड़ा हुआ है। प्लेन से जाना हो तो यहीं के बागडोगरा एयर पोर्ट उतरना पड़ेगा। यहां से टैक्सी से आप मानेभंजन पहुंच सकते हैं या चाहें तो मिरिक में रुक कर अगले दिन मानेभंजन से अपनी साहसिक यात्रा शुरू कर सकते हैं।

संदकफू का सफर है यादगार

मानेभंजन में लगभग बादलों के बीच आपका एडवेंचर शुरू हो सकता है। इस सारे रास्ते से एक तरफ कंचनजंघा और उसकी बगल से माउंट एवरेस्ट नजर आता है, लेकिन शर्त यह है कि मौसम साफ हो। अगर मौसम साफ हो तो मिट्टी की सोंधी गंध, हरे-भरे पेड़ों की अनंत श्रृंखला और पत्तों की सरसराहट आपका मन मोह लेगी। रास्ते में पहला पड़ाव है करीब दस हजार फुट ऊंचाई पर स्थित गांव मेघमा। इसका मतलब है बादलों का घर। यह पूरा रास्ता भारत-नेपाल सीमा के बीच है और सीमा पर बसे इस छोटे से गांव में बस 15-20 घर हैं। सारा रास्ता ओस और धुंध के कारण बस गीला-गीला सा लगता है। सब कुछ ठंड की चादर में लिपटा सा।

इसके बाद रास्ते में बीके भंजन, कइयां कांटा, कालपोखरी आदि गांवों के बाद संदकफू आता है। कालपोखरी करीब 11 हजार फुट की ऊंचाई पर है। यहां प्रकृति का ऐसा चमत्कार है कि कितनी ही ठंड क्यों न पड़े, इस झील का पानी कभी जमता नहीं। सारा रास्ता एकदम जलेबी की तरह चक्करदार है। पूरे रास्ते में टीले और पहाड़ एक दूसरे से आगे जाने की जैसे होड़ करते नजर आते हैं। सारे रास्ते पाइन के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष मिलेंगे। हरी घास का विस्तृत मैदान, स्वच्छंद विचरते याक, घाटियां और ढेरों अन्य महकती, खुशबू बिखेरती ऐसी वनस्पतियां कि आप उन्हें देखते थक जाएं लेकिन उनका अंत न हो।

तो पहुंच ही गए हम संदकफू

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इसके बाद आता है संदकफू। यह भी करीब फुटबाल के मैदान जितना बड़ा हिमालय की चोटी पर बसा गांव है। एक तरफ भारत तो दूसरी तरफ नेपाल और इस जगह 25-30 घर हैं। सभी लकड़ी के हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने भी टूरिस्ट लॉज बनाए हैं जिसमें आप ठहर सकते हैं या चाहें तो गांव वालों द्वारा निर्मित होटलों में भी रुक सकते हैं।

करीब 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित संदकफू का दृश्य मनोहारी है। ठंड में तो यहां हर तरफ बर्फ होती है। लेकिन अक्तूबर-नवम्बर के पहले सप्ताह तक हरियाली का समुन्दर यहां बिखरा पड़ा मिलेगा। बर्फ न हो तो भी इतनी ऊंचाई पर काफी गर्म कपड़े जरूरी हैं क्योंकि ज्यादातर यहां बादल छाया सा रहता है। धुंध और ओस के कारण अच्छी ठंड लगती है।

यहां कहीं भी खड़े हो जाइए, आपको अपने सामने एकदम करीब माउंट एवरेस्ट और कंचनजंघा चोटियां नजर आएंगी। शायद दुनिया की सबसे ऊंची क्रमश: पहली और तीसरी चोटी इससे अच्छी कहीं और से नजर नहीं आती। शुभ्र, धवल बर्फ से आच्छादित ये चोटियां आपके सामने अपनी सम्पूर्ण जादुई आभा बिखेरती हुई नजर आती हैं। शांत वातावरण में पत्तों की सरसराहट प्रकृति के बदलते स्वरूप के बीच कभी ये चोटियां रहस्यमय लगती हैं तो कभी मुस्कुराती हुई। कुछ भी हो, लगती ये सम्मोहक हैं और इतनी पास महसूस होती हैं कि बस लगता है जैसे हाथ बढ़ाया और ढेर सी बर्फ बटोर ली।

यहां की सुबह में है कुछ अलग ही बात
सुबह अगर बादल न छाए हों तो यहां का नजारा अद्भुत होता है। यहां से सूर्योदय का सुंदर दृश्य नजर आता है। सुबह चोटी के चारों ओर नीचे की तरफ काले, सफेद, नीले, स्लेटी बादल एकदम ठुंसे से नजर आते हैं। दाहिनी तरफ से करीब सवा चार बजे बादलों के बीच हल्का सिंदूरी रंग उभरता है फिर धीरे-धीरे, इंच-दर-इंच सूर्य देवता बादलों से बाहर आते हैं।

साहसिक खेलों के शौकीनों के लिए यह मार्ग एक चुनौती है। ऐसी चुनौती जिसे स्वीकार करने में उन्हें भरपूर आनंद मिलेगा और यहां इसी भावना से जाना भी चाहिए तभी रास्ते की कुछ तकलीफ या ठंड से होने वाली दिक्कत महसूस नहीं होगी।

Image source: http://www.east-himalaya.com/

http://www.trekearth.com/

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