1857 के ग़दर से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है ये इमारत

आज देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम की शुरूआत करने वाले पूजनीय मंगल पांडेय की पुण्यतिथि है. साधारण शब्दों में कहें तो मंगल पांडेय पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज उठाई और अपने बलिदान से देश के जन मानस को जगाने का काम किया.

आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम आपको एक ऐसी इमारत के बारे में बताएंगे जो सीधा सीधा इस संग्राम से जुड़ी हुई है. और इतने दशकों बाद भी उस स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाती है.  वैसे यह इमारत अंग्रेजी हुकूमत ने उन सैनिकों की याद में बनवाई थी, जो मंगल पांडेय द्वारा लगाई गई स्वतंत्रता की आग में झुलस गए थे, यानी उस क्रांति में अंग्रेजी सेना की तरफ से लड़े और मैदान-ए-जंग में शहीद हो गए .

आइये बताते हैं इस इमारत के बारे में :

दिल्ली के कश्मीरी गेट पर बनी ओल्ड टेलीग्राफ बिल्डिंग के सामने दिल्ली का रिज एरिया है, जिसमें यह इमारत मौजूद है. इस इमारत को आज “अजित गढ़” कहा जाता है. वैसे इस इमारत को अंग्रेज़ों ने “Mutiny Memorial” नाम दिया था. इसे अंग्रेज़ों ने “दिल्ली फील्ड फाॅर्स” (बटालियन) में मारे गए अंग्रेज़ सैनिकों की याद में 1863 में बनवाया था.

इस इमारत की उन दिनों भरपूर आलोचना भी की गई थी. लेकिन आप तो जानते ही हैं- जिसकी लाठी उसकी भैंस. सत्ता अंग्रेज़ों की थी. तो उन्होंने अपने सैनिकों के लिए इमारत बनवाई, लेकिन 1857 के ग़दर में मारे गए भारतियों के लिए शायद शौक भी नहीं मनाया। शायद हम इसलिए लिख रहे हैं कि ऐसी मामूली बातें इतिहास के पन्नों में जगह नहीं बना पातीं.

अंगेज़ों ने इस इमारत को जल्दबाजी में बनवाया था. इस इमारत के लिए अंग्रेज़ों ने सरकारी खर्च का प्रयोग किया था और सार्वजनिक निर्माण विभाग यानी पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) के जरिए तैयार करवाया था. इस इमारत को बनवाने के लिए लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया था और इस बिडिंग का आकर गौथिक स्टाइल में तैयार किया गया था. म्युटिनी मेमोरियल को 200 मीटर दूरी पर बने अशोक स्तंभ से जरा सा ऊंचा बनाया गया था.

आजादी की 25वीं वर्षगांठ यानी 1972 में इस इमारत का नाम बदलकर अजित गढ़ रख गया गया था. इसके अलावा सरकार ने एक पट्टिका भी लिखवाई थी, जिसपर लिखा था कि जिन शत्रुओं का नाम इस इमारत पर लिखा है वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए अमर शहीद हैं.

 

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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