योगी के तेवर और अंसारी की घर वापसी

योगी ​आदित्यानाथ के तेवर और उत्तरप्रदेश पुलिस के गाड़ी पलटने वाले स्टाइल से अच्छे अच्छे बाहूबली या तो सरेंडर कर दिए या फिर अकाउंटर में मारे गए. बचा तो सिर्फ एक और वो भी अब योगी की नगरी में वापस लौटने वाला है. हम बात कर रहे हैं बाहूबली मुख्तार अंसारी की.

जी हां, सुप्रीम कोर्ट ने बाहुबली मुख्तार अंसारी को वापस यूपी भेजने का आदेश दिया है. पंजाब सरकार की दलीलें और अंसारी को बचाने के सभी नुस्खे बेकार हो गए हैं. 2 हफ्ते के अंदर अंसारी को उत्तरप्रदेश भेजना ही होगा.

बहुजन समाज पार्टी के बाहूबली और लगातार पांच बार से चुनाव जीतकर विधायक रहने वाले मुख्तार अंसारी पंजाब से लाने के बाद किस जेल में डाला जाएंगे, यह प्रयागराज की विशेष एमपी—एमएलए कोर्ट तय करेगी. लेकिन उससे पहले आपको बताते हैं, आखिर कौन हैं, मुख्तार अंसारी जिसकी योगी की पुलिस घर वापसी का बेसर्बी से इंतजार कर रही है.

मुख्तार अंसारी पूर्वांचल के माफिया डान हैं और मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी के बाहूबली भी हैं. मायावती इन्हें गरीबों का मसीहा और रोबिन हुड तक कह चुकी हैं. इस वक्त मुख़्तार के खिलाफ इलाहाबाद की स्पेशल एमपी एमएलए कोर्ट में दस मुक़दमे हैं. इनमे से डबल मर्डर का एक मामला फाइनल स्टेज पर है. ट्रायल लगभग पूरा हो चुका है और कभी भी फैसला आ सकता है. इसके अलावा बाकी नौ मुकदमों में छह में इन दिनों गवाही के साथ ट्रायल चल रहा है. बाकी तीन मुकदमों में अभी अदालत ने मुख्तार पर चार्ज फ्रेम यानी आरोप तय नहीं किये हैं.

यूपी के मउ जिले से मुख्तार अंसारी पांच बार से विधायक रह चुके हैं. बसपा पार्टी के दीवाना हैं. हालांकि, बसपा से एक बार​ साल 2010 में निकाल दिए गए थे, लेकिन साल 2017 में फिर वापसी ले लिए गए. इस बीच अंसारी ने कौमी एकता दल नाम की पार्टी बनाई जिसका बाद में बसपा में ही विलय कर दिया. यानी वही बात कि जनता का प्रभाव है, तो आपको कुछ समय के लिए पार्टी से निकाला जा रहा है और बाद में आपको वापस ले लेंगे.

खैर, ऐसा नहीं है कि मुख्तार अंसारी या उनके परिवार का संबंध सिर्फ बसपा से ही रहा है. अंसारी के दादा मुख्तार अहमद अंसारी कांग्रेस के प्रेजीडेंट रहे हैं. ​मुख्तार अंसारी का राजनैति​क ​जीवन साल 1995 से शुरू हुआ है और वो भी एक स्टूडेंट यूनियन से. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में स्टूडेंट यूनियन से जुड़ने के बाद साल 1996 में वे विधायक बने. विधायक बनते ही अंसारी ने पूर्वांचल के बाहूबली ब्रिजेश सिंह को चुनौती दे डाली, जिसके बाद पूर्वांचल में दो गैंग ​एक्टिव हो गए. साल 2002 में अंसारी के बदमाशों और सिंह के बीच मुठभेड़ हो गई, जिसमें माना गया कि सिंह की मौत हो गई है. हालांकि, वही फिल्मी अंदाज में बाद में पता चला कि सिंह तो अभी जिंदा हैं.

अकेले खुद को बाहूबली समझने वाले अंसारी की टें हो गई. ऐसे में सिंह ने अंसारी को दबाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के उस वक्त के नेता कष्णआनांद राय को सपोर्ट करना शुरू कर दिया. राय ने मुख्तार के पांच बार से लगातार जीत रहे भाई अफजल अंसारी को साल 2002 के चुनावों में हरा दिया.

इसका खामियाजा राय को भुगतना पड़ा. पहले तो अंसारी ने मुस्लिम वोट बैंक को अपनी ओर किया. पूर्वांचल में माहौल खराब किया, दंगे करवाए और आखिरी में राय को भरे बाजार मरवा दिया. यह आरोप अंसारी पर लगता जरूर है, लेकिन कभी प्रूफ नहीं हो पाया है. जिस वक्त राय की मौत हुई थी, उस वक्त अंसारी दंगा करवाने और क्षेत्र में माहौल खराब करने की वजह से जेल में बंद थे.

राय को भरे बाजार में जब गोलियां चलाई गई थीं, तो बताते हैं कि हमला करने वालों ने एके 47 से 400 गोलियां चलाई गई थीं. अंसारी ने इस मामले के मुख्य गवाहों को भी न​हीं छोड़ा था. एक गवाह को साल 2006 में मार दिया गया, जबकि एक गवाह ने अपना बयान वापस ले लिया. यह हरकत भी कुछ ऐसी ही है, जैसा आप फिल्मों में देखते हैं. एक डॉन आखें दिखाने भर मात्र से गवाह को चुप करा देता है.

मुख्तार अंसारी को यूं ही बसपा में जगह नहीं मिली हुई है. अंसारी ने साल 2014 में मोदी लहर के बावजूद कानपूर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर मुरली मनोहर जोशी को अच्छी चुनौती दी थी. हार जरूर गए थे, लेकिन मुरली मनोहर जोशी से वो मात्र 17 हजार वोटों से पीछे रह गए थे.

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