महाशिवरात्रि को है कुम्भ का पहला शाही स्नान

इस बार का कुम्भ मेला हरिद्वार, उत्तराखंड में लगने जा रहा है। कुम्भ मेले की हिंदुओं में काफी आस्था है। दुनिया के सबसे प्राचीनतम ‘सनातन धर्म‘ में यह हिंदुस्तान में मनाया जाने वाला हिंदुओं का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है। हिंदू धर्म में कुम्भ मेला एक महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। विभिन्न समय पर लगने वाले विभिन्न कुम्भ मेलों में देश के तकरीबन हर हिस्से से करोड़ों श्रद्धालु आते हैं और कुम्भ पर्व स्थल हरिद्वार (गंगा नदी), उज्जैन (शिप्रा नदी), प्रयागराज (गंगा, यमुना और सरस्वती तीन नदियों का संगम) और नासिक (गोदावरी नदी) में स्नान, पूजा पाठ आदि करते हैं। हिंदुस्तान की चार पावन नदियों के तटों पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। हर छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुम्भ का आयोजन भी किया जाता है। प्रयाग में 2013 को कुम्भ मेले का आयोजन किया गया था उसके बाद वहीं पर छह वर्ष बाद 2019 को अर्धकुम्भ मेला लगाया गया। जिसकी भव्ययता की चर्चा दुनिया भर में चर्चा का विषय रही थी। कुम्भ मेला सिर्फ स्नान के लिए ही नहीं जाना जाता बल्कि इस मेले के आयोजन के पीछे हमारी सनातन आस्था के अलावा धर्म के लोगों का एक दूसरे से मेलमिलाप, प्रवचन, साधु संतों की सेवा, गरीबों को भोजन कराना, शिक्षा, आध्यात्मिकता आदि होती है।

सनातन धर्म में खगोलीय गणनाओं के अनुसार जब सूर्य और चंद्रमा, वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं और बृहस्पति मेष राशि में प्रवेश करता है, तभी कुम्भ, जनवरी माह में मकर संक्रांति के दिन से शुरू होता है। मकर संक्रांति में होने वाले इस योग को विशेष मंगलकारी माना जाता है। सनातन धर्म में माना जाता है कि मकर संक्रांति के इस दिन देव लोक, स्वर्ग और इष्ट देवों के द्वार खुल जाते हैं। इस पावन दिन में स्नान करने से ईश्वर की आत्मा के प्रति सहजता हो जाती है। इस दिन स्नान करना स्वर्ग दर्शन के बराबर माना जाता है। हिंदू धर्म में इसकी बहुत मान्यता है। इसे कुम्भ स्नान योग भी कहा जाता है।

इस महापर्व कुम्भ को आठवीं शताब्दि में हिंदू फीलॉसफर और संत आदि शंकराचार्य जी ने शुरू करवाया था। उनका मकसद था कि समय समय पर देश के प्रत्येक हिस्से से हिंदू और हिंदू संस्थाएं एक जगह, एक साथ इकट्ठे हो कर धर्म कर्म का काम करें और दर्शन शास्त्र पर वार्तालाप का हिस्सा बनें।

कुम्भ का ज्योतिषीय महत्व

हमारे पौराणिक विश्वास, आस्था और संस्कृति से अलग भारतीय ज्योतिषियों के अनुसार ज्योतिष विद्या में कुम्भ का अपना अलग महत्व है। कुम्भ महोत्सव बृहस्पति राशि के कुम्भ राशि में प्रवेश और सूर्य राशि के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुडा है। माना जाता है कि ग्रहों की यही स्थिति हरिद्वार में कलकल बहती पावन गंगा नदी के किनारे स्थित हर की पौड़ी पर गंगा जल को औषधिकृत करती है। माना जाता है कि इन दिनों यहां का गंगा जल और ज्यादा अमृतमय हो जाता है। इस कारण इन दिनों लाखों की संख्या में साधु संत, सन्यासी, श्रद्धालु और अन्य लोग हिंदुस्तान के तकरीबन हर हिस्से से अपनी अंतरात्मा और तन की शुद्धि के लिए इस पवित्र स्थान पर पवित्र स्नान करने के लिए आते हैं। आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार करते हैं। साधना करते हैं, पूजा पाठ करते हैं। यह भी माना जाता है कि अर्ध कुम्भ के दौरान गंगा में स्नान आध्यात्मिक दृष्टि से भी अनुकूल रहता है। यह समय ग्रहों की स्थिति में एकाग्रता और ध्यान साधना के लिए काफी अनुकूल रहता है। वैसे, तो देश में हर हिंदू त्योहार एक समान श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाए जाते हैं। लेकिन कुम्भ मेले में देश विदेश से इस महामेले को देखने और इसमें आत्मसात होने के लिए सबसे अधिक संख्या में श्रद्धालु, तीर्थ यात्री, पर्यटक इक्कट्ठा होते हैं।

पौराणिक कथा

सागर मन्थन

कुम्भ पर्व के आयोजन को लेकर कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुम्भ से अमृत की कुछ बूंदें गिरने को लेकर है। कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हेें दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुम्भ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इन्द्रपुत्र जयन्त अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा लिया। तत्पश्चात, अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक) पर कलश से अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से और शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बांटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया। अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरन्तर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। इस कारण कुम्भ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुम्भ देव लोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं। जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुम्भ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरी थी, वहां-वहां कुम्भ पर्व मनाया जाता है।

कुम्भ जैसे नहान मेले

कुम्भ मेले की ही तरह हिंदुस्तान के कई हिस्सों में कई अवसरों पर और समय समय पर नहान मेले लगते रहते हैं। इन छोटे नहान मेलों में कई समुदाय के लोग और श्रद्धालु स्नान, ध्यान, पूजा पाठ करने के लिए इक्कट्ठा होते हैं। इनमें प्रमुख हैं माघ मेला और मकर मेला आदि।

तमिलनाडू में लगने वाले माघ मेले में श्रद्धालु पवित्र नदी में स्नान करते हैं। इस मेले को प्राचीन काल का मेला माना जाता जाता है। यह माघ मेला कावेरी नदी के किनारे महामहाम टैंक पर प्रत्येक 12 वर्ष में किया जाता है। इस माघ मेले में लाखों की संख्या में दक्षिण भारतीय हिंदू आते हैं। तमिलनाडु के इस माघ मेले को तमिल कुम्भ मेला भी कहा जाता है।

इसी तरह से हिंदुस्तान के अन्य स्थानों में भी माघ मेला या मकर मेला लगाया और मनाया जाता है। इनमें कुरुक्षेत्र और सोनीपत के साथ-साथ पनौती (नेपाल) में भी श्रद्धालुओं का स्नान और मेला, कुम्भ मेले की तरह मनाया जाता है।

एक से तीन महीने तक चलने वाले कुम्भ मेले में कुछ अलग अलग दिन ऐसे होते हैं जिस दिन कुम्भ मेले में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अन्य दिनों के मुकाबले काफी अधिक होती है। कुम्भ मेला हिंदुस्तान के हिंदू श्रद्बालु ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लाखों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। उत्तर प्रदेश के प्रयाग में लगने वाले कुम्भ मेले में सबसे अधिक श्रद्धालु इक्कट्ठा होते हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर उत्तराखंड के हरिद्वार में लगने वाले कुम्भ मेले में श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में होती है। जानकारी के अनुसार 2001 में कुम्भ मेले में करीब 60 लाख हिंदू श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया था। कुम्भ मेला दुनिया का एक मात्र मेला है जिसमें लाखों की संख्या में हिंदू श्रद्धालु काफी शांतिपूर्ण तरीके से इक्कट्ठे होकर इसे मनाते हैं। यही एक मात्र मेला है जिसमें साधू संतों की कई मंडलियां, समाजिक कार्यकर्ता, श्रद्धालुओं की टोलियां एक साथ नियम से शांतिपूर्ण स्नान, ध्यान, पूजा पाठ, सत्संग और मेल मिलाप के साथ इक्कट्ठा होते हैं। अकेले अमावस्या पर ही पवित्र नदी में डुबकी लगाने वालों की संख्या लाखों में पहुंच जाती है।

कुम्भ मेले में ‘कुम्भ’ का अर्थ

संस्कृत में ‘कुम्भ’ का अर्थ होता है मटका। वैदिक शब्दिक में कुम्भ में अमृत होने की बात कही गई है। हमारे अति प्रचीनतम संस्कृत साहित्यों और वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद साहित वैदिक और वैदिक काल के बाद के ग्रंथों और संस्कृत साहित्यों में कुम्भ का उल्लेख मिलता है। ज्योतिषीय पुस्तकों आदि में भी कुम्भ को राशि चिन्ह के प्रतीक के तौर पर जाना पहचाना जाता है।

‘मेले’ का संस्कृत में अर्थ होता है मिलना, इक्कट्ठे होना। ऋग्वेद सहित हिंदुओं के ग्रंथों और पौराणिक पुस्तकों, लेखों आदि में हिंदुओं के समारोह के संबोधन के रूप में ‘मेला’ शब्द भी समाहित है। इस प्रकार ‘कुम्भ’ और ‘मेला’ शब्दों के मेल से कुम्भ मेला की उत्पत्ति हुई। यानि, मेला, जहां हिंदु श्रद्धालु अमृत की इच्छा, अपने पूर्व पापों के नाश, मोक्ष और अध्यात्म के लिए इक्कट्ठा होते हैं। हमारे प्राचीन हिंदू शास्त्रों के अनुसार कुम्भ (कलश) में अमृत है और अमृत से भरा यह कुम्भ (कलश) समुद्र मंथन के उपरांत निकला था। मान्यता है कि स्वर्ग ले जाते समय इस अमृत कलश से जिन चार जगह अमृत की बूंदें छलक कर गिरी थीं वहां कुम्भ मेला लगाया जाता है। ये चारों जगह प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक हैं।

हमारी प्राचीन और मध्यकालीन हिंदू ग्रंथों, शास्त्रों और अन्य प्राचीन पुस्तकों में कुम्भ मेले शब्द का कोई वर्णन नहीं है लेकिन प्रयाग स्थित गंगा जी, यमुना जी और सरस्वती जी के संगम तट पर समय-समय पर नहान का मेला लगने का प्रमाण मिलता है। जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालु इक्कट्ठा होते थे पवित्र नदियों में स्नान करते थे। इसका वर्णन ऋग्वेद में भी है।

16 शताब्दी में राम चरित मानस में भी तुलसीदास जी ने प्रयाग में वार्षिक मेले का वर्णन किया है। वैसे, हरिद्वार में लगने वाला कुम्भ मेला असल में असली कुम्भ माना जाता है। इस संदर्भ में प्राचीन ग्रंथों और लेखों में विस्तार से वर्णन किया गया है। प्रयाग की ही तरह उज्जैन और नासिक में लगने वाले कुम्भ भी अतिप्राचीन माने जाते हैं। इन्हें ‘सिंहस्थ’ कुम्भ मेला कहा जाता है। कुम्भ मेले को समय और ज्योतिषी गणना के हिसाब ‘महा कुम्भ’, ‘अर्ध कुम्भ’ की तरह भी मनाया जाता है।

कुम्भ के मुख्य आकर्षण अखाड़े

कुम्भ में साधु संतों के 13 मुख्य अखाड़े हिस्सा लेते हैं। इनमें पहले सात अखाड़े शैव अखाड़े हैं। इनमें महानिर्वाणी अखाड़ा, अटल अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, आनन्द अखाड़ा, जूना अखाड़ा, अव्हान अखाड़ा और अग्नि अखाड़ा।

दूसरे नंबर पर आते है वैष्णव अखाड़े। इमने तीन मुख्य अखाड़े हैं। निर्वाणी अखाड़ा, दिगम्बर अखाड़ और निर्मोही अखाड़ा।

तीसरे नंबर पर आते हैं सिक्ख अखाड़ा। इनमें बड़ा पंचायती उदासिन अखाड़ा, छोटा पंचायती उदासिन अखाड़ा और निर्मल अखाड़ा।

शैव और वैष्णव मिला कर दसों अखाड़े ‘दसनामीस’ कहलाते हैं। कहा जाता है कि इन अखाड़ों की स्थापना आदि शंकराचार्य जी ने धर्म रक्षा और पारम्परिक निर्वाह के लिए किया था।

कुम्भ के प्रकार

महाकुम्भ :- महाकुम्भ 12 पूर्ण कुम्भ के बाद प्रत्येक 144 वर्ष बाद लगाया और मनाया जाता है। यह महाकुम्भ का मेला इन्सान अपने जीवन काल में एक बार ही देख पाता है। महाकुम्भ केवल प्रयाग राज में ही लगाया जाता है।

पूर्ण कुम्भ :- पूर्ण कुम्भ मेला या कुम्भ प्रत्येक 12 वर्ष के उपरांत आता है। पूर्ण कुम्भ प्रत्येक 12 वर्ष में बारी-बारी से प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में लगाया जाता है।

अर्ध कुम्भ :- अर्ध कुम्भ मेला प्रत्येक छह वर्ष बाद दो पूर्ण कुम्भ मेलों के बीच में आता है। इन्हें प्रयाग राज या हरिद्वार में ही लगाया और मनाया जाता है।

कुम्भ मेला :- कुम्भ मेला प्रयाग राज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में राज्य सरकार द्वारा लगवाया जाता है।

माघ (कुम्भ) मेला :- माघ मेले को मिनी कुम्भ भी कहा जाता है। और यह प्रत्येक वर्ष केवल प्रयाग राज में ही लगाया जाता है। माघ मेला, माघ महिने में यानी हिंदू कैलेंडर के हिसाब 14 जनवरी से फरवरी के अंत तक लगाया जाता है।

ज्योतिषी बदलाव में कुम्भ का स्थान

हरिद्वार :- हरिद्वार में कुम्भ मेला तब लगाया जाता है जब हिंदू कैलेंडर में चैत्र माह में सूर्य राशि, मेष राशि में और बृहस्पति राशि, कुम्भ राशि में प्रवेश करती है।

प्रयाग :- हिंदू कैलेंडर के हिसाब से माघ माह में जब सूर्य और चंद्रमा, मकर राशि में और बृहस्पति राशि, मेष राशि में प्रवेश करती है तब प्रयाग में कुम्भ का आयोजन किया जाता है।

नासिक :- हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद माह में जब सूर्य और बृहस्पति राशि, सिंह राशि में प्रवेश करते हैं तब नासिक में कुम्भ मेला लगाया जाता है।

उज्जैन :- हिंदू तिथि अनुसार वैशाख माह में जब बृहस्पति राशि, सिंह राशि में और सूर्य, मेष राशि प्रवेश करता है या बृहस्पति, सूर्य और चंद्र, तुला राशि में प्रवेश करते हैं तब उज्जैन में कुम्भ मेला लगाया जाता है।

धार्मिक क्रिया

हिंदू श्रद्धालुओं और तीर्थ यात्रियों द्वारा अमावस्या को पवित्र नदियों में पूजा पाठ के साथ स्नान या डुबकी लगाने की परम्परा कुम्भ मेलों में निभाई जाती है। लेकिन हिंदू श्रद्धालु और तीर्थ यात्री पवित्र नदियों में डुबकी लगाने के पहले 13 अखाड़ों के साधु संतों द्वारा पवित्र नदी में पहले डुबकी लगाने और स्नान का इंतजार करते हैं। अखाड़ों के इस स्नान को ‘शाही स्नान’ या ‘राज योगी स्नान’ कहा जाता है। इस स्नान के लिए जाने से पहले अखाड़ों के साधु संत जुलूस के रूप में अपने-अपने बैनर, झंडे, हाथी घोड़ों पर सवार होकर, ढोल-ताशे और बैंड-बाजे के साथ निकलते हैं। अलग अलग अखाड़ों के अपनी अपनी परम्परा के हिसाब से नागा साधु नग्न अवस्था में या नाममात्र के वस्त्र धारण किए हुए, कई अपने शरीर पर भस्म लपेटे हुए निकलते हैं।

इन सब में सबसे आगे सबसे बड़े अखाड़े ‘जूना अखाड़े’ के साधु संत होते हैं। ये साधु संत हिंदुस्तान के चार मुख्यालयों श्रींगेरी, द्वारका, ज्योतिरमठ और गोवर्धन से आते हैं। महानिर्वाणी और निरंजनी अखाड़े में भी काफी बड़ी संख्या में साधु संतों की टोलियां होती हैं। लोग सड़कों पर इन साधुओं को देखने के लिए जमा हो जाते हैं।

हरिद्वार कुम्भ मेले के स्नान

  • बृहस्पतिवार, 14 जनवरी 2021 को मकर सक्रांति के पहले स्नान से शुरू हुआ कुम्भ मेला।
  • इसके बाद 11 फरवरी, 2021, बृहस्पतिवार को दूसरा स्नान मौनी अमावस्या को किया गया।
  • 16 फरवरी, 2021, मंगलवार को तीसरा स्नान बसंत पंचमी को किया गया।
  • चौथा स्नान, शनिवार, 27 फरवरी, 2021 को माघ पूर्णिमा को किया गया।
  • 11 मार्च, 2021, बृहस्पतिवार को महाशिवरात्रि को हरिद्वार में कुम्भ का पहला शाही स्नान साधु संतों के 13 विभिन्न अखाड़ों द्वारा किया जाएगा।
  • फिर पूरे एक महीने बाद सोमवति अमावस्या, सोमवार, 12 अप्रैल, 2021 को कुम्भ का दूसरा शाही स्नान अखाड़ों के साधु संत करेंगे।
  • चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, 13 अप्रैल, 2021, मंगलवार और 14 अप्रैल 2021, बुधवार, बैसाखी को तीसरा शाही स्नान किया जाएगा।
  • 21 अप्रैल, 2021, बुधवार को रामनवमी को पवित्र गंगाजी में स्नान किया जाएगा।
  • 27, अप्रैल, 2021, मंगलवार को चैत्र पूर्णिमा को चौथा शाही स्नान किया जाना है।

स्नान के लिए हरिद्वार के प्रमुख घाट

शाही स्नान ब्रह्मकुंड, हर की पौड़ी पर किया जाएगा। कुम्भ मेले में स्नान के लिए हरिद्वार के तकरीबन सभी घाटों पर तैयारियां की गई हैं। इनमें कुछ प्रमुख घाट हैं, हर की पौड़ी, अष्ठी प्रवत घाट, सुभाष घाट, गउ घाट, सप्त सरोवर क्षेत्र घाट, सर्वानंद घाट, पंतद्वीप घाट, कांगड़ा घाट, गणेश घाट, वैरागी कैम्प घाट, सति घाट, दक्क्षेश्वर घाट, सिंह द्वार घाट, सीता घाट आदी।

देव डोली

हरिद्वार के कुम्भ मेले में अखाड़ों के साधु संतों के अलावा एक और मुख्य आकर्षण होगा ‘देव डोली’। हिंदुओं के इस सबसे बड़े महोत्सव में देवी मां की पालकी (देव डोली) भी सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र बनने जा रही हैं। देवी की पालकी हिमालय क्षेत्र के गांवों में निकाली जाती हैं। देव डोली के अवसर पर कई दिनों तक त्यौहार मनाया जाता है।

हिंदुओं के इस सबसे बड़े महोत्सव कुम्भ मेले में उत्तराखंड के पहाड़ों से करीब 100 देव डोलियां हरिद्वार पहुंच रही हैं। 25 अप्रैल, 2021 को पवित्र गंगा जी में इन देव डोलियों को स्नान करवाया जाएगा। जानकारी के अनुसार ये देव डोलियां श्री बद्रीनाथ मंदिर और सेम महाराज के ध्वज के साथ निकाली जाएंगीं।

कुम्भ मेले में स्नान के दिनों के अलावा जो दिन बचते हैं। उन दिनों में हरिद्वार और इसके आसपास कई दर्शनीय स्थल, पर्यटन स्थल, एडवेंचर स्थल आदी हैं जहां जाया जा सकता है। हरिद्वार में एक दो दिन ठहरना हो तो यहां मनसा देवी मंदिर, चंडी देवी मंदिर, माया देवी मंदिर, दक्ष महादेव मंदिर, पारद शिवलिंग, भारत माता मंदिर, पावन धाम मंदिर, हर की पौड़ी, शांति कुंज आश्रम और भीमगोडा कुंड जाया जा सकता है।

हरिद्वार से बाहर निकल कर दो-चार दिन के लिए कहीं घूमने का विचार हो और समय भी हो तो ऋषिकेश, मसूरी, देहरादून और लच्छीवाला जाया जा सकता है।

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