दास्तां-ए-मोहब्बत – A Poem by Nightbulb Fan

भावनाओं के समंदर में हमारे, अंतर बस इतना सा था।
मेरी तेरे लिए ही थी और तेरी मेरे लिए भी थी।।

फर्क हम दोनों के मोहब्बत में बस इतना सा था।
मेरी बस तुमसे ही थी और तुम्हें मुझसे भी थी।।

इंतियाज़ हम दोनों की खुशियों में बस इतना सा था।
मेरी तुमसे ही थी और तुम्हारी मुझसे भी थी।।

मैंने बहोत समझाया अपने दिल ए नादान को था।
ये तो ना माना मगर तुम्हे तो सब पता ही था।।

फासला हम दोनों के साथ होने में बस इतना सा था।
नज़रें मेरी बस तुमपे ही थी और तुम्हारी मुझपे भी थी।।

हमारे ख्वाबों के शहर में विषमता बस इतनी सी ही थी।
मुझे झलक बस तेरी ही थी और तुम्हें मेरी भी थी।।

फ़र्क हम दोनों के बीते हुए लम्हों में बस इतना सा था।
मुझे यादें बस तेरी ही थी मगर तुम्हें बस मेरी भी थी।।

साभार :

आशीष कुमार

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