जब Nehru की एक Cigarette के लिए प्लेन “Indore” भेजना पड़ा

देश के पहले प्रधानमंत्री और महात्मा गांधी के पसंदीदा जवाहर लाल नेहरू कई विवादों में घिरे हुए दिखाई देते हैं. कांग्रेस जितना ही छुपाले, लेकिन कई बातें इतिहास के पन्नों से मिट नहीं पातीं हैं और विपक्षी दल इस बात का लाभ भी आसानी से उठाते हैं.

विवाद तो नेहरू से जुड़े कई हैं, लेकिन यह किस्सा कुछ हटकर है. दरअसल, एक दिन बतौर प्रधानमंत्री नेहरू भोपाल जाते हैं। भोपाल में नेहरू मध्यप्रदेश के राजभवन में जाकर ठहरते हैं. नेहरू के राजभवन में पहुंचने की जानकारी मिलते ही राजभवन में उनके रहने सहने के लिए इंतजाम शुरू हो जाते हैं. राजभवन के कर्मचारी एक एक चीज पर बड़ी बारीकी से ध्यान देते हैं कि कहीं भी नेहरू के आमभगत में कोई कमी ना रह जाए.

ऐसे में उन्हें ध्यान आता है कि नेहरू खाना खाने के बाद तो सिगरेट पीते हैं और सिगरेट भी वो, जो उस वक्त राजभवन में नहीं होती और ना ही भोपाल में कहीं मिलती है। ऐसे में सब परेशानी में आ जाते हैं कि कहीं प्रधानमंत्री नेहरू को सिगरेट नहीं दी गई तो क्या होगा।

काफी सोच विचार के बाद एक रणनीति बनाई जाती है। नेहरू की पसंदीदा सिगरेट जिसका नाम था 555, उस सिगरेट का पता लगाया जाता है कि वो सिगरेट किस शहर में मिलती है। कुछ समय की कड़ी मशक्क्त के बाद पता चलता है कि नेहरू का ब्रांड तो इंदौर में मिलेगा। ऐसा वैसे शौकीन लोग ही करते हैं। जैसा आज दिल्ली के लोगों में दिखाई देता है। दिल्ली के शौकीन लोग पराठे खाने के लिए पुरानी दिल्ली की पराठे वाली गली चले जाते हैं या मुरथल के ढाबों पर।

खैर, तो हुआ यूं कि उस सिगरेट के लिए एक प्लेन तैयार किया जाता है। यह प्लेन सिर्फ सिगरेट के लिए इंदौर भेजा जाता है। वो सिगरेट इंदौर प्रशासन को कहकर तुरंत एयरपोर्ट मंगवाई जाती है, ताकि एयरप्लेन लैंड हो और वो सिगरेट का पैकेट जल्द से जल्द प्लेन में रखवा दिया जाए।

ये उस वक्त की बात है जब आम इंसान प्लेन में बैठने का मात्र सपना ही देख सकता था। लेकिन दूसरी ओर, प्लेन से नेहरू के लिए सिगरेट एयरलिफ्ट करना बताता है कि नेहरू अपनी लग्जरी लाइफ से कॉम्प्रोमाइज नही करते थे। नेहरू खाना खाने के बाद सिगरेट पीने के आदि थे और शायद यही वजह रही होगी कि सिगरेट एयरलिफ्ट करवाना राजभवन कर्मचारियों का सबसे जरूरी काम बन गया था.

इस खबर की पुष्टि के लिए आप मध्यप्रदेश के राजभवन की आधीकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं, जहां इतिहास के यादगार किस्से लिखे हुए हैं और यह किस्सा भी उनमें शामिल है.

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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