आखिर, उन 59 कारसेवकों का क्या दोष था ? || Godhra, Gujarat 2002

27 फरवरी 2002. स्थान गुजरात का गोधरा रेलवे स्टेशन.

माहौल आम दिनों जैसा ही था, कुछ भी अलग नहीं. स्टेशन पर सब कुछ सामान्य था.

सुबह तकरीबन साढ़े सात बजे एक ट्रेन गोधरा रेलवे स्टेशन पर आ रही थी. वह ट्रेन चार घंटे देरी से चल रही थी. ट्रेन में बैठे यात्री घर पहुंचने के लिए बैताब हो रहे थे. ट्रेन में बच्चे और औरतें भी थीं. यह ट्रेन कोई सामान्य यात्रियों से भरी नहीं थी, बल्कि 25 फरवरी को अहमदाबाद से अयोध्या गए कारसेवकों की थी, जो 27 फरवरी 2002 को अपने घर वापस लौट रहे थे.

अयोध्या में भगवान श्रीराम के पुर्णआहूति महायग कार्यक्रम में यह कारसेवक शामिल होने गए थे. कारसेवकों की यह टोली लगभग 1700 की थी. राम का नाम लेते वापस लौट रहे यह कारसेवक नहीं जानते थे कि वापस लौटते वक्त उनकी आंखें ऐसा भयानक मंजर देखेंगी, जिसकी कल्पना भी करना असंभव था.

साबरमती एक्सप्रेस नाम की वह ट्रेन सुबह करीबन 7 बजकर 43 मिनट पर रोजाना की तरह गोधरा रेलवे स्टेशन से पहले सिग्नल पर रुकती है. सिग्नल जैसे ही हरी ​बत्ती दिखाता है, वैसे ही अचानक ट्रेन दुबारा रुक जाती है. ट्रेन के कैबिन में बैठे ड्राइवर को पता चलता है कि ट्रेन को तो रोकने के लिए कई बार इमरजेंसी ब्रैक का इस्तेमाल किया गया है.

जिस वक्त ट्रेन का ड्राइवर अपने इंस्ट्रूमेंट को चैक कर रहा होता है, उसी वक्त नजदीक के इलाके से 2000 मुस्लिमों की भीड़ ट्रेन पर हमला बोल देती है. ट्रेन में बैठे लोग जितने में समझ पाते कि क्या हो रहा है, उससे पहले ही ट्रेन पर वो भीड़ पत्थर बाजी शुरू कर देती है. ट्रेन के चार कोच के दरवाजे बाहर से तार से बांध दिए जाते हैं, ताकि कार सेवक बाहर ना निकल पाएं. ट्रेन पर एक झुंड पत्थरबाजी कर रहा होता है, तो वहीं एक गुट साबरमति एक्सप्रेस की बोगी एस—6 की खि​ड़कियों से पेट्रोल डालकर आग लगा देता है.

वह भीड़ चंद मिनट में यह काम करके वहां से भाग जाती है, लेकिन साबरमति एक्सप्रेस की बोगी एस—6 जलकर खाक हो जाती है. चंद मिनटों में 59 कारसेवक जिंदा जला दिए जाते हैं. इनमें 27 महिलाएं और 10 मासूम बच्चे भी शामिल थे. इस नरसंहार में 48 कारसेवक घायल हो गए थे. इस मामले के बाद ​पूरे गुजरात में दंगे भड़क गए थे.

लेकिन उन दंगों पर मीडिया एक्टिव हो गई थी, लेकिन आज भी 59 कारसेवकों की मौत पर चर्चा नहीं होती कि मासूम लोगों का क्या दोष था. दंगे भड़के और उन दंगों में काफी लोगों की जान गई, लेकिन 59 कार सेवकों की मौत क्यूं हुई, इस मसले पर चर्चा कभी नहीं होती है.

त्रिभुवन शर्मा ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के हिंदी अख़बार "सांध्य टाइम्स" के साथ साल 2013 में की थी. 4 साल अख़बार में हार्डकोर जर्नलिज्म को वक़्त देने के बाद उन्होंने Nightbulb.in को 2018 में लॉन्च किया

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